राजस्थान के बीकानेर के युवा वैज्ञानिक डॉ. मनोज मीणा ने सीताफल के बीजों से एक ऐसा क्रांतिकारी जैविक नैनो कीटनाशक विकसित किया है, जो भंडारित अनाज को कीटों से सुरक्षित रखने में बेहद प्रभावी है। यह नवाचार रासायनिक मुक्त होने के कारण पर्यावरण के अनुकूल है और इसे राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिली है, जिसके परिणामस्वरूप डॉ. मीणा को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू से मिलने का अवसर भी प्राप्त हुआ। उनके इस शोध को राष्ट्रपति ने समाज के हित में बताते हुए सराहा, जिससे किसानों को अनाज भंडारण में होने वाले नुकसान से बचाने की एक नई उम्मीद जगी है।
अभिनव जैविक नैनो कीटनाशक का विकास
स्वामी केशवानंद राजस्थान कृषि विश्वविद्यालय में गेस्ट फैकल्टी डॉ. मनोज मीणा ने करीब ढाई वर्ष के गहन शोध के बाद सीताफल के बीजों के तेल से इस विशेष जैविक नैनो कीटनाशक को तैयार किया है। यह कीटनाशक नैनो टेक्नोलॉजी का उपयोग करके एक विशेष जैविक नैनो इमल्शन के रूप में विकसित किया गया है। इस तकनीक की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि इसमें किसी भी रासायनिक पदार्थ का उपयोग नहीं किया गया है, जिससे यह पूरी तरह से सुरक्षित और पर्यावरण के अनुकूल है। यह नवाचार गेहूं, चना, बाजरा, मूंग सहित अन्य भंडारित अनाज को घुन, इल्ली और सुरसुरी जैसे हानिकारक कीटों से बचाने में अत्यधिक प्रभावी सिद्ध हुआ है। पारंपरिक कीटनाशकों के रासायनिक अवशेषों की चिंता को देखते हुए, यह जैविक विकल्प एक महत्वपूर्ण समाधान प्रस्तुत करता है।
किसानों के लिए क्रांतिकारी पहल और पर्यावरण हितैषी लाभ
डॉ. मनोज मीणा का मुख्य उद्देश्य किसानों को रसायन मुक्त, सुरक्षित और पर्यावरण के अनुकूल विकल्प उपलब्ध कराना है। भारत में अनाज के भंडारण के दौरान कीटों के कारण बड़ी मात्रा में फसल बर्बाद हो जाती है, जिससे किसानों को भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ता है। यह जैविक नैनो कीटनाशक इस समस्या का एक स्थायी और प्रभावी समाधान प्रदान करता है। यह न केवल अनाज को लंबे समय तक सुरक्षित रखता है, बल्कि मानव स्वास्थ्य और मिट्टी की उर्वरता पर भी कोई नकारात्मक प्रभाव नहीं डालता है। किसानों के लिए यह तकनीक अनाज के नुकसान को कम करने और उनके उत्पादों को बाजार में बेहतर मूल्य दिलाने में सहायक होगी, क्योंकि उपभोक्ता भी अब रसायन मुक्त उत्पादों की ओर आकर्षित हो रहे हैं। यह पहल भारत सरकार के जैविक खेती और टिकाऊ कृषि पद्धतियों को बढ़ावा देने के प्रयासों के अनुरूप भी है।
राष्ट्रीय पहचान और राष्ट्रपति की सराहना
डॉ. मनोज मीणा के इस अभिनव शोध को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिली है। उन्हें इस तकनीक के लिए दो पेटेंट भी मिल चुके हैं, जो उनके काम की वैज्ञानिक प्रामाणिकता और विशिष्टता को दर्शाता है। इसी महत्वपूर्ण उपलब्धि के आधार पर उन्हें जनजातीय गौरव उत्सव-2026 के दौरान राष्ट्रपति भवन में आयोजित एक विशेष कार्यक्रम में आमंत्रित किया गया। वहां राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने उनसे व्यक्तिगत रूप से बातचीत की और समाज के हित में किए गए ऐसे अनुसंधानों की खुले दिल से सराहना की। डॉ. मीणा का कहना है कि राष्ट्रपति भवन में मिला यह सम्मान उनके लिए प्रेरणा का एक बड़ा स्रोत है। यह राष्ट्रीय स्तर पर मान्यता न केवल डॉ. मीणा के लिए बल्कि देश के अन्य युवा वैज्ञानिकों के लिए भी प्रेरणा का काम करेगी, ताकि वे भी समाजोपयोगी अनुसंधान में योगदान दे सकें।
भविष्य की योजनाएं और किसानों तक पहुंच
डॉ. मनोज मीणा का अगला लक्ष्य इस तकनीक को प्रयोगशाला तक ही सीमित न रखकर, इसे देश भर के किसानों और अनाज भंडारण सुविधाओं तक पहुंचाना है। उनका मानना है कि किसी भी शोध की सार्थकता तभी है जब उसका लाभ समाज के सबसे निचले तबके तक पहुंचे। इस जैविक नैनो कीटनाशक को बड़े पैमाने पर उपलब्ध कराने से अनाज की बर्बादी को काफी हद तक कम किया जा सकेगा, जिससे देश की खाद्य सुरक्षा मजबूत होगी और किसानों की आय में वृद्धि होगी। डॉ. मीणा अब विभिन्न कृषि विश्वविद्यालयों और सरकारी एजेंसियों के साथ मिलकर इस तकनीक के व्यावसायीकरण और किसानों तक इसकी पहुंच सुनिश्चित करने की दिशा में काम कर रहे हैं। यह स्वदेशी और पर्यावरण-अनुकूल समाधान भारत को कृषि क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है, जो रासायनिक कीटनाशकों पर हमारी निर्भरता को कम करेगा और सुरक्षित खाद्य उत्पादन को बढ़ावा देगा।






