छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा (CMM) और उससे संबद्ध माइंस श्रमिक संघ (MSWS) अपने संस्थापक कॉमरेड शंकर गुहा नियोगी के शहादत दिवस की तैयारियों में पूरी तरह जुट गए हैं। इस महत्वपूर्ण दिन, जो प्रतिवर्ष 28 सितंबर को मनाया जाता है, से पहले दोनों संगठन राज्य के विभिन्न गांवों, विशेषकर खनन प्रभावित क्षेत्रों में व्यापक जनसंपर्क अभियान चला रहे हैं। इस अभियान का मुख्य उद्देश्य मजदूरों, किसानों और स्थानीय आदिवासियों को उनके अधिकारों के प्रति जागरूक करना, उनकी समस्याओं को सुनना और उन्हें आगामी शहादत दिवस समारोह के लिए लामबंद करना है।
अभियान का उद्देश्य और पृष्ठभूमि
छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा और माइंस श्रमिक संघ का यह गांव-गांव अभियान महज एक स्मृति समारोह नहीं है, बल्कि यह कॉमरेड शंकर गुहा नियोगी द्वारा स्थापित मजदूर आंदोलन की विरासत को आगे बढ़ाने का एक प्रयास है। नियोगी ने अपना जीवन मजदूरों और किसानों के हक की लड़ाई में समर्पित कर दिया था, और उनकी शहादत आज भी लाखों लोगों को प्रेरणा देती है। संगठन इस अभियान के माध्यम से वर्तमान समय में मजदूरों के सामने आ रही चुनौतियों, जैसे न्यूनतम मजदूरी का अभाव, असुरक्षित कार्यस्थल, विस्थापन का मुद्दा, और खनिज संपदा से होने वाले लाभ में स्थानीय लोगों की हिस्सेदारी जैसे मुद्दों को प्रमुखता से उठा रहा है। CMM का मानना है कि नियोगी के विचार आज भी प्रासंगिक हैं और राज्य की खनिज संपदा का लाभ स्थानीय लोगों तक पहुंचना चाहिए, न कि केवल बड़े कॉर्पोरेट घरानों तक। यह अभियान लोगों को यह याद दिलाने का भी एक तरीका है कि उनके अधिकारों के लिए एकजुटता कितनी महत्वपूर्ण है।
गांव-गांव में जनसंपर्क और रणनीति

इस अभियान के तहत छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा और माइंस श्रमिक संघ के कार्यकर्ता और नेता राज्य के दुर्ग, बालोद, राजनांदगांव, कबीरधाम और रायगढ़ जैसे प्रमुख जिलों के सुदूर गांवों तक पहुंच रहे हैं। वे छोटी-छोटी नुक्कड़ सभाएं आयोजित कर रहे हैं, मजदूरों और किसानों के साथ सीधे संवाद कर रहे हैं, और उन्हें कॉमरेड नियोगी के संघर्ष और बलिदान के बारे में बता रहे हैं। प्रचार सामग्री जैसे पर्चे और लघु पुस्तिकाएं भी वितरित की जा रही हैं, जिनमें संगठन के उद्देश्यों और मौजूदा मांगों का विस्तृत विवरण है। सांस्कृतिक कार्यक्रमों और लोकगीतों के माध्यम से भी लोगों को जोड़ने का प्रयास किया जा रहा है, ताकि संदेश अधिक प्रभावी ढंग से उन तक पहुंच सके। संगठन के नेताओं का कहना है कि उन्हें ग्रामीणों और मजदूरों से जबरदस्त समर्थन मिल रहा है, जो दर्शाता है कि उनके मुद्दे आज भी जीवंत हैं और लोग बदलाव चाहते हैं।
आगामी कार्यक्रम और राजनीतिक असर
गांव-गांव के इस अभियान का समापन 28 सितंबर को एक भव्य शहादत दिवस समारोह के रूप में होगा। इस दिन दुर्ग या राजनांदगांव में एक बड़ी जनसभा और रैली का आयोजन किया जा सकता है, जिसमें राज्य भर से हजारों मजदूर, किसान और सामाजिक कार्यकर्ता शामिल होंगे। यह आयोजन न केवल कॉमरेड शंकर गुहा नियोगी को श्रद्धांजलि देगा, बल्कि यह राज्य सरकार और खनन कंपनियों पर मजदूरों और किसानों की मांगों को पूरा करने के लिए दबाव भी बनाएगा। छत्तीसगढ़ में आगामी विधानसभा चुनावों को देखते हुए, इस तरह की लामबंदी का राजनीतिक असर भी हो सकता है। मजदूर और किसान एक बड़ा वोट बैंक हैं, और उनके मुद्दों को उठाना किसी भी राजनीतिक दल के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है। यह अभियान छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा और माइंस श्रमिक संघ की संगठनात्मक शक्ति का भी प्रदर्शन करेगा।
चुनौतियाँ और भविष्य की राह
हालांकि, छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा और माइंस श्रमिक संघ को अपने अभियान में कई चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। सरकारी नीतियों का दबाव, बड़े कॉर्पोरेट घरानों का प्रभाव, और संसाधनों की कमी जैसी बाधाएं उनके रास्ते में आती हैं। इसके बावजूद, संगठन के कार्यकर्ता और नेता दृढ़ संकल्पित हैं। उनका मानना है कि कॉमरेड नियोगी की विचारधारा और संघर्ष ही उन्हें आगे बढ़ने की शक्ति देता है। यह अभियान न केवल शहादत दिवस की तैयारी है, बल्कि यह छत्तीसगढ़ के मेहनतकश लोगों के अधिकारों के लिए एक सतत लड़ाई का प्रतीक भी है। भविष्य में भी ये संगठन मजदूरों और किसानों के हक के लिए अपनी आवाज बुलंद करते रहेंगे, ताकि शंकर गुहा नियोगी का सपना साकार हो सके।










