धर्म, सदाचार और नैतिकता के पाठ मनुष्य को दिशा दिखाने के लिए हैं। वे सत्य, असत्य का भेद करना सिखा सकते हैं। मनुष्य को जीवन मार्ग पर चलना स्वयं ही पड़ता है और निर्णय भी खुद ही लेने होते हैं।
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मार्ग सही हो, निर्णय उचित हों, इसे सुनिश्चित करना संभव है। इसके लिए लोभ और मोह त्यागना होता है। क्रोध और अहंकार त्यागना होता है। काम को वश में करना होता है। यही आत्म-नियंत्रण है।
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स्वयं पर नियंत्रण नहीं, तो धर्म, नैतिकता और सदाचरण की बात व्यर्थ है। जीवन में समस्याओं और दुखों का कारण आत्म-नियंत्रण न होना है। धर्म कोई चमत्कार नहीं करता। धर्म के प्रकाश में किए गए कर्म ही फल देते हैं।
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बड़े परिणामों के लिए विकारों को वश में करना तो दूर रहा, मनुष्य जीवन को सामान्य बनाए रखने के लिए भी कोई प्रयास नहीं कर रहा है। इससे समस्याओं के अंबार लगे हुए हैं। आज वह हर तरह के लोभ के प्रभाव में है।