प्रशासन की लापरवाही के बीच जगदलपुर के ग्रामीणों ने खुद सड़क बनाई। श्रमदान से आत्मनिर्भरता की मिसाल पेश की, महिलाओं-युवाओं की भागीदारी ने बढ़ाया हौसला।
जगदलपुर । बारिश में बह चुकी सड़क अब तक नहीं बन पाई है। महीनों बीत जाने के बाद भी जब प्रशासन ने कोई कदम नहीं उठाया, तब ग्रामवासियों ने स्वयं श्रमदान कर सड़क निर्माण का बीड़ा उठाया।
यह तस्वीर है बस्तर जिले के एक ऐसे गांव की, जहां ग्रामीणों ने सरकारी उदासीनता के बीच अपनी मेहनत और एकजुटता से विकास का रास्ता खुद तैयार किया।
प्रशासनिक लापरवाही से टूटी उम्मीदें
ग्राम बोदलगांव (जगदलपुर) को मुख्य मार्ग से जोड़ने वाली कच्ची सड़क पिछले मानसून में पूरी तरह बह गई थी।
सड़क टूट जाने से गांव का संपर्क मुख्य मार्ग से कट गया, जिससे
- स्कूली बच्चों को आने-जाने में परेशानी,
- किसानों को अपनी उपज बाजार तक ले जाने में कठिनाई,
- और बीमारों को अस्पताल पहुंचाने में भारी दिक्कतें
झेलनी पड़ीं।
ग्रामीणों का कहना है कि सड़क निर्माण के लिए कई बार जनपद और जिला प्रशासन को पत्र लिखा गया, लेकिन किसी ने मौके पर आकर स्थिति नहीं देखी।
ग्रामीणों ने खुद संभाली जिम्मेदारी
प्रशासन की चुप्पी देख आखिरकार ग्रामीणों ने स्वयं सड़क बनाने का निर्णय लिया।
गांव के बुजुर्गों और युवाओं की बैठक हुई, और सर्वसम्मति से तय हुआ कि सड़क के पुनर्निर्माण के लिए श्रमदान किया जाएगा।
ग्रामीणों ने फावड़ा, बेलचा, टोकनी लेकर कार्य शुरू किया।
कई महिलाएं भी इस अभियान में शामिल हुईं।
वे सड़क पर मिट्टी डालने, गड्ढे भरने और पत्थर लगाने का काम कर रही हैं।
गांव के युवक लक्ष्मण कश्यप ने बताया —
“हमने बहुत इंतजार किया, पर कोई मदद नहीं आई। अब हमने ठान लिया है कि अपनी सड़क खुद बनाएंगे। यह हमारी जरूरत है, किसी पर निर्भर नहीं रह सकते।”
महिलाएं भी बनीं बदलाव की साथी
इस श्रमदान में गांव की महिलाएं भी बराबर की हिस्सेदार हैं।
महिला मंडल की सदस्य सीता बघेल कहती हैं —
“हम अपने बच्चों को स्कूल भेजना चाहती हैं, लेकिन सड़क नहीं थी। अब अगर हम सब मिलकर काम करेंगे, तो गांव फिर जुड़ जाएगा।”
महिलाएं मिट्टी उठाने से लेकर पानी लाने तक हर काम कर रही हैं।
उनकी भागीदारी से गांव में सामुदायिक सहयोग और आत्मनिर्भरता की भावना और मजबूत हुई है।
एक दिन सामूहिक श्रमदान से बनी सड़क की शुरुआत
ग्रामीणों ने रविवार को ‘सामूहिक श्रमदान दिवस’ घोषित किया।
सुबह से लेकर शाम तक सभी ने मिलकर लगभग दो किलोमीटर सड़क का पुनर्निर्माण कार्य पूरा किया।
सड़क भले ही पक्की नहीं है, लेकिन ग्रामीणों की मेहनत से बनी यह राह उनके जज़्बे की मिसाल बन गई है।
गांव के बुजुर्ग हरिहर नेताम ने कहा —
“हमारे पास पैसे नहीं हैं, लेकिन हिम्मत और एकता है। जहां सरकार नहीं पहुंची, वहां गांव ने खुद रास्ता बना लिया।”
युवाओं की अगुवाई में चला अभियान
गांव के युवाओं ने सड़क निर्माण में नेतृत्व की भूमिका निभाई।
उन्होंने गांव-गांव जाकर लोगों को जोड़ने का काम किया, दान में बांस, मिट्टी, और पत्थर जुटाए।
कुछ स्थानीय व्यवसायियों ने ड्रम और डीजल देकर मदद की।
इस पहल ने युवाओं में सामाजिक जिम्मेदारी की भावना को भी जगाया है।
गांव के युवा अब भविष्य में तालाब मरम्मत और नाली सफाई जैसे कामों में भी श्रमदान करने की योजना बना रहे हैं।
पंचायत ने कहा — जल्द शुरू होगा निर्माण कार्य
जब यह मामला मीडिया में आया, तो स्थानीय पंचायत सचिव और जनपद अधिकारी मौके पर पहुंचे।
उन्होंने स्वीकार किया कि सड़क निर्माण का प्रस्ताव पहले भेजा गया था लेकिन बजट स्वीकृति में देरी हुई।
अब बताया जा रहा है कि नवंबर तक स्थायी सड़क निर्माण कार्य शुरू किया जाएगा।
पंचायत सचिव दिलीप ठाकुर ने कहा —
“गांववालों का उत्साह सराहनीय है। शासन से स्वीकृति मिलते ही पक्की सड़क का काम शुरू कर दिया जाएगा।”
ग्रामीणों की पहल बनी प्रेरणा
बस्तर जैसे क्षेत्र में जहां विकास कार्य अक्सर देरी से होते हैं, वहां ग्रामीणों की यह स्व-सहायता पहल बाकी इलाकों के लिए प्रेरणा बन गई है।
सोशल मीडिया पर भी इस अभियान की तस्वीरें वायरल हो रही हैं।
लोग ग्रामीणों के जज्बे की तारीफ कर रहे हैं कि उन्होंने बिना किसी सरकारी मदद के सामूहिक एकजुटता से काम पूरा किया।
विशेषज्ञों की राय
समाजशास्त्री डॉ. मनीष तिवारी का कहना है —
“ऐसी पहलें दिखाती हैं कि जब प्रशासन निष्क्रिय हो जाता है, तब जनता अपने सामूहिक सहयोग से विकास का रास्ता खुद बना सकती है। यह लोकतंत्र का असली अर्थ है।”
प्रशासन पर उठे सवाल
हालांकि, इस घटना ने प्रशासन की कार्यशैली पर भी गंभीर सवाल उठाए हैं।
गांव वालों का कहना है कि सड़क टूटे तीन महीने हो चुके हैं, लेकिन किसी अधिकारी ने मौके पर आकर स्थिति नहीं जानी।
इससे लोगों में निराशा और असंतोष बढ़ा है।
सामाजिक कार्यकर्ता अशोक यादव ने कहा —
“जब तक जनता आवाज नहीं उठाती, तब तक प्रशासन नहीं जागता। यही हमारी व्यवस्था की सबसे बड़ी खामी है।”
निष्कर्ष
जगदलपुर के इस गांव के ग्रामीणों ने यह साबित कर दिया कि
जहां चाह है, वहां राह है।
सरकार की अनदेखी के बावजूद उन्होंने अपने दम पर वह काम किया, जो प्रशासन को करना चाहिए था।
यह कहानी सिर्फ एक सड़क की नहीं, बल्कि आत्मनिर्भरता, एकता और संघर्ष की मिसाल है।
ऐसी पहलें दिखाती हैं कि यदि जनता संगठित हो जाए, तो विकास की कोई राह मुश्किल नहीं।




