राष्ट्रीय शिक्षा दिवस पर भोपाल के मौलाना आज़ाद केंद्रीय पुस्तकालय में 134 नई पुस्तकों का विमोचन हुआ, शिक्षा और साहित्य के समन्वय का संदेश दिया गया।
भोपाल। भारत के पहले शिक्षा मंत्री और स्वतंत्रता सेनानी मौलाना अबुल कलाम आज़ाद की जयंती के अवसर पर भोपाल स्थित शासकीय मौलाना आज़ाद केंद्रीय पुस्तकालय में राष्ट्रीय शिक्षा दिवस का भव्य आयोजन किया गया। इस अवसर पर उनकी प्रतिमा पर माल्यार्पण कर उन्हें श्रद्धांजलि दी गई और 134 नई हिंदी एवं अंग्रेज़ी साहित्यिक पुस्तकों का विमोचन किया गया।
कार्यक्रम की अध्यक्षता पुस्तकालय की क्षेत्रीय ग्रंथपाल रत्ना वाधवानी ने की। उन्होंने कहा कि यह दिन केवल एक महान व्यक्तित्व को याद करने का अवसर नहीं है, बल्कि शिक्षा, ज्ञान और सामाजिक एकता के प्रति हमारे संकल्प को पुनः सशक्त करने का दिन है।
📘 134 नई पुस्तकों का विमोचन — साहित्य और शिक्षा के संगम का प्रतीक
राष्ट्रीय शिक्षा दिवस के अवसर पर विमोचित की गई इन पुस्तकों में साहित्य, दर्शन, विज्ञान और सामाजिक चेतना से जुड़ी विविध विधाओं की रचनाएं शामिल हैं।
इनमें प्रमुख हैं —
- ‘सुवर्णलता’ (आशापूर्णा देवी)
- ‘वेदवर्णित वनस्पतियाँ’ (आचार्य बालकृष्ण)
- ‘शिखंडी’ (नरेंद्र कोहली)
- ‘तुम पहले क्यों नहीं आए’ (कैलाश सत्यार्थी)
- ‘जिंदगीनामा’ (कृष्णा सोबती)
इन पुस्तकों का उद्देश्य पाठकों को साहित्यिक गहराई के साथ सामाजिक और मानवीय संवेदनाओं से जोड़ना है।
🌿 शिक्षा के आदर्श — मौलाना अबुल कलाम आज़ाद
इस अवसर पर वक्ताओं ने मौलाना आज़ाद के योगदान को याद करते हुए कहा कि उन्होंने स्वतंत्र भारत की शिक्षा नीति की नींव रखी थी।
उन्होंने भारतीय शिक्षा को एक समावेशी, आधुनिक और वैज्ञानिक दिशा देने का सपना देखा। उनके प्रयासों से ही अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी, आईआईटी खड़गपुर, और यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन (UGC) जैसी संस्थाओं की स्थापना संभव हो सकी।
ग्रंथपाल रत्ना वाधवानी ने कहा —
“मौलाना आज़ाद ने शिक्षा को राष्ट्रनिर्माण का सबसे प्रभावी साधन माना। उनके विचार आज भी नई पीढ़ी को प्रेरणा देते हैं कि ज्ञान ही सच्ची स्वतंत्रता का मार्ग है।”
🏫 शिक्षा और सामाजिक समरसता का संदेश
राष्ट्रीय शिक्षा दिवस के इस आयोजन का उद्देश्य केवल पुस्तकों का विमोचन नहीं, बल्कि शिक्षा के प्रति जागरूकता फैलाना और समाज में ज्ञान के महत्व को रेखांकित करना था।
वाधवानी ने कहा कि पुस्तकालय केवल किताबों का संग्रह नहीं, बल्कि विचारों और समाज के विकास का केंद्र है।
कार्यक्रम में उपस्थित छात्रों और पाठकों को बताया गया कि लोक शिक्षण संचालनालय के बजट से खरीदी गई ये पुस्तकें अब पुस्तकालय में अध्ययनार्थ उपलब्ध होंगी, ताकि पाठक ज्ञान के विविध आयामों से जुड़ सकें।
✍️ कार्यक्रम में मौजूद रही साहित्य और शिक्षा जगत की हस्तियाँ
आयोजन में पुस्तकालय की ग्रंथपाल निशा बातव, प्रबंधक रचित मालवीय, और कई साहित्यकार, अध्यापक एवं पुस्तकालय सदस्य उपस्थित रहे।
सभी ने मौलाना आज़ाद की प्रतिमा पर पुष्प अर्पित किए और उनके आदर्शों पर चलने का संकल्प लिया।
कार्यक्रम के दौरान पुस्तकालय के युवा सदस्यों ने “शिक्षा के माध्यम से राष्ट्र निर्माण” विषय पर अपने विचार भी साझा किए।
एक छात्रा ने कहा, “मौलाना आज़ाद ने दिखाया कि शिक्षा केवल करियर का साधन नहीं, बल्कि समाज को जागरूक और समान बनाने का माध्यम है।”
📖 पुस्तकालय बनेगा विचारों का केंद्र
ग्रंथपाल वाधवानी ने घोषणा की कि आने वाले महीनों में पुस्तकालय में ‘साहित्य संवाद श्रृंखला’ शुरू की जाएगी, जिसमें नई पुस्तकों पर पाठक और लेखक आपस में चर्चा कर सकेंगे।
उन्होंने कहा कि “किताबें हमें विचार देती हैं, और विचार समाज को दिशा। यह हमारा प्रयास रहेगा कि पुस्तकालय एक जीवंत अध्ययन केंद्र बने।”
🌼 मौलाना आज़ाद की शिक्षा नीति आज भी प्रासंगिक
शिक्षा विशेषज्ञों ने कहा कि मौलाना आज़ाद का सपना था कि भारत में हर बच्चा गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्राप्त करे, चाहे उसका सामाजिक या आर्थिक स्तर कुछ भी हो।
उनकी नीतियों में समानता, नैतिकता और विज्ञान आधारित दृष्टिकोण का समावेश था।
आज जब शिक्षा प्रणाली डिजिटल और वैश्विक हो रही है, उनके विचार पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक हैं।
💡 राष्ट्रीय शिक्षा दिवस का महत्व
भारत सरकार ने 2008 में निर्णय लिया था कि 11 नवंबर को हर वर्ष राष्ट्रीय शिक्षा दिवस के रूप में मनाया जाएगा।
इस दिन को देश के पहले शिक्षा मंत्री मौलाना अबुल कलाम आज़ाद की जयंती के रूप में मनाया जाता है।
इस दिन का उद्देश्य शिक्षा की भूमिका को समझना, शिक्षक-विद्यार्थी संबंध को सशक्त बनाना, और समाज में ज्ञान के प्रति सम्मान की भावना जगाना है।
🎓 ज्ञान ही प्रगति का पथ — निष्कर्ष नहीं, संदेश
कार्यक्रम के अंत में ग्रंथपाल रत्ना वाधवानी ने कहा —
“ज्ञान केवल किताबों में नहीं, बल्कि उसे साझा करने और समाज में फैलाने में है। शिक्षा हर व्यक्ति का अधिकार है, और इसी भावना से यह दिन मनाना ही मौलाना आज़ाद को सच्ची श्रद्धांजलि है।”
राष्ट्रीय शिक्षा दिवस का यह आयोजन न केवल श्रद्धांजलि का प्रतीक था, बल्कि यह याद दिलाता है कि शिक्षा ही वह दीपक है, जो हर युग में अंधकार को मिटाता है।











