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CRED के पास करोड़ों यूजर्स का डेटा, क्या मार्क जुकरबर्ग को मिलेगा एक्सेस? उठे बड़े सवाल

 नई दिल्ली

अगर आप पुराने फेसबुक यूजर हैं तो आपको ये बात पता होगी. फेसबुक के लॉगइन पेज पर एक टैगलाइन लिखी होती थी. 'फेसबुक फ्री है और हमेशा फ्री रहेगा'. लेकिन ऐसा नहीं है फेसबुक अब दर्जनों पेड सर्विस चलाता है और डेटा बेचता है। 

दिलचस्प ये है कि कई साल पहले ही वो टैगलाइन भी कंपनी ने लॉगइन पेज से हटा ली. एक वादा टूटा. फिर जब वॉट्सऐप को जकरबर्ग ने खरीदा तो एक और वादा किया गया. वादा ये था कि वॉट्सऐप को अलग रखा जाएगा और इसका डेटा नहीं बेचा जाएगा ना वॉट्सऐप से कमाई की जाएगी. ये वादा भी काफी पहले टूट चूका। 

हर बार जकरबर्ग ने तोड़ा है वादा, क्या कुणाल शाह भी ऐसा करेंगे?

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अब एक और वादा देखने को मिला है. भारतीय ऐप क्रेड के फाउंडर कुणाल शाह वॉट्सऐप के ग्लोबल सीईओ बन गए हैं और क्रेड में मेटा ने 900 मिलियन डॉलर्स निवेश कर दिया है. लोगों को तुरंत लगा कि अब क्रेड का डेटा भी फेसबुक का हो जाएगा, लेकिन जैसे फेसबुक और वॉट्सऐप के शुरुआती समय में वादा किया गया था, यहां भी एक वादा दिखा। 

कंपनी का स्टैंड है कि वो क्रेड का डेटा नहीं देगी. लेकिन क्या आप इस बात को मानेंगे कि मेटा, मार्क जकरबर्ग और क्रेड के कुणाल शाह अपने इस वादे पर कायम रहेंगे? कब तक? 

वॉट्सऐप दो लोगों ने मिलकर बनाया था. ब्रायन ऐक्टन और जेन कूम. दोनों ही प्राइवेसी के बड़े एडवोकेट थे और डेटा नहीं बेचना चाहते थे. उन्होंने तय किया था कि वो कुछ भी हो जाए, लेकिन यूजर डेटा नहीं बेचेंगे। 

ऐप ने खूब तरक्की की और बाद में फेसबुक ने वॉट्सऐप को खरीद लिया. मार्क जकरबर्ग का वादा था कि वो वॉट्सऐप से कभी पैसे नहीं कमाएंगे और ना ही वॉट्सऐप का यूजर डेटा बेचेंगे। 

कुछ साल सबकुछ ठीक चला, लेकिन मार्क जकरबर्ग अपनी आदत के मुताबिक पूराना वादा भूल गए और वॉट्सऐप का यूजर डेटा पेरेंट कंपनी यानी फेसबुक सर्विसेज के साथ शेयर होने लगा. आलम ये है कि अब वॉट्सऐप पर ऐड्स आ रहे हैं और पेड प्लान लॉन्च हो गए हैं। 

वॉट्सऐप के फाउंडर का मैने इंटरव्यू किया तो उन्होंने बाताया था कि वॉट्सऐप की असली ताकत काफी पहले खत्म हो चुकी है. शुरुआत में वॉट्सऐप के दोनों फाउंडर्स ऐप बिकने के बाद भी कंपनी में काम करते रहे, लेकिन धीरे धीरे डेटा शेयरिंग को लेकर मार्क जकरबर्ग से उनकी तकरार बढ़ी और दोनों ने ही वॉट्सऐप को छोड़ दिया। 

क्रेड और कुणाल शाह के पास भारतीय यूजर्स का संवेदनशील डेटा
असल में क्रेड एक डेटा प्लेटफॉर्म है, जो भारत के सबसे प्रीमियम यूजर्स का बेहद गहरा और संवेदनशील डेटा अपने पास रखता है. यह डेटा सिर्फ नाम और नंबर तक सीमित नहीं है. इसमें यूजर का खर्च करने का तरीका, उसकी फाइनेंशियल आदतें, उसकी क्रेडिट हिस्ट्री, यहां तक कि उसकी लाइफस्टाइल तक शामिल है। 

अगर कोई यूजर अपने ईमेल को क्रेड से लिंक करता है, तो ऐप को उसके क्रेडिट कार्ड स्टेटमेंट, बिल, इंश्योरेंस, निवेश और लोन से जुड़ी जानकारी तक पहुंच मिल जाती है. यानी यूजर की पूरी फाइनेंशियल प्रोफाइल एक ही जगह तैयार हो जाती है। 

यही वजह है कि भले ही क्रेड सालों से घाटे में चल रही कंपनी रही हो, लेकिन उसकी वैल्यू कम नहीं हुई. क्योंकि टेक दुनिया में आज सबसे कीमती चीज प्रॉफिट नहीं, डेटा है. और वो भी ऐसा डेटा जो क्लीन हो, भरोसेमंद हो और हाई-वैल्यू यूजर्स का हो। 

अब इसे वॉट्सऐप के साथ जोड़कर देखिए. भारत में वॉट्सऐप के 50 करोड़ से ज्यादा यूजर्स हैं. यह दुनिया का सबसे बड़ा वॉट्सऐप बाजार है. लेकिन इतने बड़े यूजर बेस के बावजूद वॉट्सऐप की सबसे बड़ी समस्या रही है… कमाई। 

मेटा पिछले कई सालों से वॉट्सऐप को मोनेटाइज करने की कोशिश कर रहा है, लेकिन उसे वैसी सफलता नहीं मिली जैसी गूगल पे, फोन पे या पेटीएम को मिली. यहीं पर CRED और कुनाल शाह का रोल अहम हो जाता है। 

मेटा के लिए क्यों जरूरी हैं कुणाल शाह?
कुणाल शाह ने FreeCharge से लेकर CRED तक एक चीज बार-बार साबित की है, वह टेक्नोलॉजी से ज्यादा लोगों के बिहेवियर को समझते हैं. वह जानते हैं कि यूजर कब खर्च करता है, क्यों करता है और उसे किस तरह के ऑफर से रोका या बढ़ाया जा सकता है. सबसे बड़ी बात कुणाल शाह के ऐप के पास भारतीय यूजर्स के सेंसिटिव डेटा का भरमार है. ऐसा डेटा जो मेटा भारत में अब तक हासिल नहीं कर पाया है। 

मेटा को अब ऐसे ही लीडर की जरूरत है. क्योंकि वॉट्सऐप का अगला फेज सिर्फ मैसेजिंग का नहीं, बल्कि पेमेंट, लोन, इंश्योरेंस और शॉपिंग का होने वाला है. लेकिन इस पूरी कहानी का एक दूसरा और ज्यादा गंभीर पहलू भी है। 

जब फेसबुक ने वॉट्सऐप को खरीदा था, तब यह कहा गया था कि वॉट्सऐप यूजर डेटा को फेसबुक के साथ शेयर नहीं करेगा. लेकिन समय के साथ यह वादा कमजोर होता गया. आज वॉट्सऐप और मेटा के बीच डेटा शेयरिंग को लेकर कई बार सवाल उठ चुके हैं। 

अब मेटा ने क्रेड में करीब 900 मिलियन डॉलर का निवेश किया है. साथ ही क्रेड के फाउंडर को वॉट्सऐप की कमान सौंपी जा रही है. मेटा यह जरूर कहता है कि उसे क्रेड यूजर डेटा तक सीधी पहुंच नहीं मिलेगी. लेकिन टेक इंडस्ट्री के पैटर्न को देखें तो यह भरोसा पूरी तरह से सहज नहीं लगता। 

इतिहास यही बताता है कि जब निवेश, लीडरशिप और प्लेटफॉर्म एक ही दिशा में जुड़ते हैं, तो डेटा का फ्लो भी धीरे-धीरे उसी डायरेक्शन में बढ़ता है. अगर फ्यूचर में क्रेड और वॉट्सऐप के बीच किसी भी तरह का डेटा इंटीग्रेशन होता है, तो इसके नतीजे बहुत बड़े हो सकते हैं. क्योंकि क्रेड के पास भारत के सबसे प्रीमियम और फाइनेंशियली एक्टिव यूजर्स का डेटा है, जबकि वॉट्सऐप के पास सबसे बड़ा यूजर बेस। 

क्रेडिट कार्ड और तमाम फिनांशियल डिटेल्स
इन दोनों के मेल से एक ऐसा सिस्टम बन सकता है जो यूजर के बिहेवियर को समझकर उसे टारगेटेड ऑफर दे, लोन दे, खरीदारी कराए और पूरी डिजिटल लाइफ को कंट्रोल करे. यह सुविधा के नाम पर एक सुपर ऐप होगा, लेकिन इसके पीछे डेटा सेंट्रलाइज्ड भी होगा। 

भारत के लिए यह स्थिति और सेंसिटिव है. भारत पहले ही दुनिया का सबसे बड़ा डिजिटल मार्केट बन चुका है. यहां के यूजर्स की संख्या भी सबसे ज्यादा है और डेटा भी. ऐसे में अगर इस डेटा का इस्तेमाल सिर्फ कंपनियों के फायदे के लिए होता है, तो यह चिंता का विषय है। 

कुणाल शाह की कहानी जरूर एक नजीर है. उन्होंने 2010 में फ्रीचार्ज नाम का ऐप शुरू किया, जिसे 2015 में स्नैपडील को लगभग 449 मिलियन डॉलर में बेच दिया। 

दिलचस्प बात यह है कि स्नैपडील ने कुछ ही सालों बाद फ्रीचार्ज ऐप को भारी नुकसान में बेच दिया. इसके बाद 2018 में उन्होंने क्रेड शुरू किया, जो आज भी कई सालों से घाटे में होने के बावजूद एक हाई-वैल्यू कंपनी बनी हुई है। 

हाल ही में ये भी देखने को मिल रहा है कि कैसे भारत को ग्लोबल AI कंपनियां डेटा कलेक्शन के लिए यूज कर रही हैं. चूंकि भारत में सबसे ज्यादा यूजर्स हैं, इसलिए फ्री सर्विसेज दे कर यहां के यूजर्स के डेटा पर एआई को ट्रेन किया जा रहा है. अगर इतना डेटा कंपनी खरीदे तो अरबों डॉलर्स देने होते, लेकिन भारतीय यूजर्स फ्री में ग्लोबल एआई मॉडल्स को ट्रेन कर रहे हैं. इतना ही नहीं, अमेरिकी कंपनियां अपने एडवांस्ड एआई मॉडल भारत में लॉन्च भी नहीं कर रही हैं। 

ये तमाम चीजें इस बात की तरफ इशारा करती हैं कि क्या भारत फिर से सिर्फ एक डेटा सोर्स बनकर रह जाएगा? क्या भारतीय यूजर्स की फाइनेंशियल और पर्सनल जानकारी धीरे-धीरे ग्लोबल टेक कंपनियों के कंट्रोल में चली जाएगी? और क्या हम सुविधा के बदले अपनी डिजिटल पहचान और प्राइवेसी खो देंगे?

Rana Sikander
लेखक / Author

Versatile journalist with experience in conducting in-depth interviews, analyzing complex data, and producing compelling narratives.

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