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तेल में आग और बाजार में भागमभाग: क्या भारतीय निवेशकों को घबराना चाहिए? हिस्ट्री क्या कहती है?

नई दिल्ली 

क्या पश्चिम एशिया में बढ़ता तनाव भारत की अर्थव्यवस्था की रफ्तार थाम सकता है? मिसाइल हमलों और जवाबी कार्रवाई की खबरों के बीच वैश्विक बाजारों में घबराहट साफ दिख रही है. 2 मार्च 2026 को निफ्टी 50 और सेंसेक्स करीब 1.8% तक फिसल गए, सरकारी बॉन्ड यील्ड में हल्की तेजी आई, ब्रेंट क्रूड लगभग 6% उछला और सोने की कीमतें 3% बढ़ीं. सवाल यह है कि क्या यह उथल-पुथल भारत की लंबी अवधि की विकास यात्रा को प्रभावित करेगी, या यह केवल एक अस्थायी झटका है?

हालिया विश्लेषण में एक्सिस एसेट मैनेजमेंट (Axis Asset Management) ने साफ किया है कि भले ही अमेरिका-इजराइल बनाम ईरान टकराव ने निवेशकों की चिंता बढ़ाई हो, लेकिन इतिहास बताता है कि ऐसे संघर्ष भारतीय शेयर बाजारों को लंबे समय तक पटरी से नहीं उतार पाए हैं.
कच्चा तेल: भारत के लिए सबसे बड़ा जोखिम

इस एनालिसिस के मुताबिक, भारत अपनी जरूरत का 80% से अधिक कच्चा तेल आयात करता है. इसलिए पश्चिम एशिया में अस्थिरता का सीधा असर तेल की कीमतों पर पड़ता है. यदि ईरान होरमुज जलडमरूमध्य को बाधित करता है, तो यह वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति के लिए बड़ा खतरा होगा. दुनिया के लगभग 20% कच्चे तेल और 30% एलएनजी का व्यापार इसी रास्ते से गुजरता है, और भारत की करीब आधी ऊर्जा आपूर्ति भी इसी मार्ग पर निर्भर है.

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तेल की कीमतों में तेज उछाल से भारत का चालू खाता घाटा बढ़ सकता है, महंगाई दबाव में आ सकती है और विमानन, पेंट, सीमेंट तथा केमिकल जैसे सेक्टरों की लागत बढ़ सकती है. हालांकि, पिछले अनुभव बताते हैं कि जब तक तेल की कीमतें लंबे समय तक ऊंची नहीं टिकतीं, तब तक शेयर बाजार स्थायी गिरावट का शिकार नहीं होते. रूस–यूक्रेन युद्ध के दौरान भी ब्रेंट क्रूड 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर गया था, लेकिन शुरुआती गिरावट के बाद बाजार संभल गए और साल अंत में सकारात्मक रिटर्न दिया.
रुपये और विदेशी निवेश का असर

भू-राजनीतिक तनाव के समय अमेरिकी डॉलर मजबूत होता है, जिससे उभरते बाजारों की मुद्राओं पर दबाव आता है. भारतीय रुपया भी इससे अछूता नहीं रहता. विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों की बिकवाली से रुपये में अस्थायी कमजोरी देखी जा सकती है.

फिर भी भारत की मजबूत विदेशी मुद्रा भंडार स्थिति, नियंत्रित चालू खाता घाटा और संतुलित राजकोषीय स्थिति सुरक्षा कवच का काम करती है. 2013 के टेपर टैंट्रम, 2020 की महामारी और 2022 के युद्ध जैसे दौर में भी रुपया दबाव में आया, लेकिन शेयर बाजारों में लंबी अवधि की गिरावट नहीं आई.
आरबीआई की भूमिका और बाजार की मानसिकता

रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (Reserve Bank of India) ऐसे समय में स्थिरता का अहम स्तंभ बनता है. केंद्रीय बैंक ने अतीत में अस्थायी महंगाई झटकों को नजरअंदाज करते हुए मूल महंगाई और विकास की स्थिरता पर ध्यान केंद्रित किया है. तरलता प्रबंधन के जरिए बाजार में भरोसा बनाए रखा गया है, ताकि घबराहट स्थायी संकट में न बदले.

पिछले 15 वर्षों का इतिहास देखें तो हर बड़े संघर्ष के दौरान शुरुआती गिरावट आई, लेकिन बाजारों ने जल्द ही संतुलन पा लिया.

    2014 के क्रीमिया संकट
    2016 की सर्जिकल स्ट्राइक
    2019 के बालाकोट एयरस्ट्राइक
    2022 के रूस–यूक्रेन युद्ध
    2023 के इजराइल–हमास संघर्ष

इन सबके दौरान यही पैटर्न दिखा कि बाजार जल्द ही पटरी पर लौट आया. यहां तक कि 2025 के ऑपरेशन

सिंदूर के समय भी शुरुआती घबराहट के बाद स्थिरता लौट आई. असल में बाजार भावनाओं से ज्यादा इस बात का आकलन करते हैं कि आर्थिक असर कितना लंबा और गहरा होगा. जब यह स्पष्ट हो जाता है कि सप्लाई चेन पर असर सीमित है और घरेलू मांग मजबूत बनी हुई है, तो जोखिम प्रीमियम घटने लगता है और निवेशक दोबारा सक्रिय हो जाते हैं.
लंबी अवधि के निवेशकों के लिए संदेश

इतिहास बताता है कि संघर्षों के समय घबराकर बाजार से बाहर निकलना अक्सर नुकसानदेह साबित हुआ है. जिन्होंने गिरावट के दौरान निवेश छोड़ा, वे बाद की तेजी से चूक गए. इसलिए अनुशासन, विविधीकरण और लंबी अवधि की सोच ही ऐसे दौर में सबसे कारगर रणनीति मानी गई है.

ईरान वाला तनाव गंभीर जरूर है, लेकिन भारतीय बाजारों के लिए यह कोई अनजाना अनुभव नहीं. शॉर्ट टर्म में उतार-चढ़ाव के बावजूद देश की विकास की कहानी घरेलू खपत, पूंजीगत व्यय, डिजिटलीकरण और मैन्युफैक्चरिंग विस्तार पर टिकी है. ऐसे में हर भू-राजनीतिक झटका स्थायी मोड़ नहीं, बल्कि अस्थायी विराम साबित हुआ है.

 

Rana Sikander
लेखक / Author

Versatile journalist with experience in conducting in-depth interviews, analyzing complex data, and producing compelling narratives.

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