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इंदौर में बेकाबू ई-रिक्शा, नियंत्रण नीति अब तक अधूरी, हादसों में हो रहा इजाफा

इंदौर
कुछ वर्ष पहले जब शहर में ई-रिक्शा का चलन शुरू हुआ था तो शहरवासियों को उम्मीद थी कि उन्हें आवागमन के लिए प्रदूषण रहित साधन मिल गया। न वाहन की कर्कश आवाज सुनाई देगी न इससे निकलने वाला काला धुआं नजर आएगा। ऐसा हुआ भी, लेकिन राहत के नाम पर शुरू हुई सुविधा शहरवासियों के लिए अब परेशानी का सबब बन गई है। शहर में ई-रिक्शा की संख्या इतनी तेजी से बढ़ी कि किसी को कुछ समझ ही नहीं आया। राजवाड़ा जैसा सघन क्षेत्र जहां पैदल चलना भी मुश्किल है वहां ये ई-रिक्शा बेखौफ होकर सड़क पर मंडराते हैं और कोई कुछ नहीं कर पाता। राजवाड़ा पर तो पुलिस चौकी के समीप जिम्मेदारों की आंखों के सामने ही अस्थाई ई-रिक्शा स्टैंड बन गया है। आज हालत यह है कि जिस गली, मोहल्ले, कालोनी, सड़क पर पर निकल जाओ, ई-रिक्शा ही नजर आते हैं। चौंकाने वाली बात यह है कि ई-रिक्शा की संख्या नियंत्रित करने के लिए आज तक कोई नीति नहीं बनी। इतना ही नहीं न तो इनके लिए कोई रूट प्लान तैयार किया गया न और न कभी किराया नियंत्रित करने का प्रयास हुआ। ऐसा नहीं कि जिम्मेदारों ने कागजों पर ई-रिक्शा को नियंत्रित करने का प्रयास न किया हो, लेकिन ये प्रयास कभी कागजों से निकलकर मैदान में नजर नहीं आए।
 
बाहर हजार से ज्यादा ई-रिक्शा
करीब छह माह पहले महापौर ने खुद सार्वजनिक रूप से घोषणा की थी कि राजवाड़ा क्षेत्र ई-रिक्शा मुक्त होगा, लेकिन घोषणा भी हवा में उड़ गई और कुछ नहीं हुआ। परिवहन विभाग के अनुसार शहर में वर्तमान में बारह हजार से ज्यादा ई-रिक्शा दौड़ रहे हैं। हाई कोर्ट खुद परिवहन विभाग, जिला प्रशासन और नगर निगम को ई-रिक्शा की वजह से शहरवासियों को हो रही परेशानी को लेकर फटकार लगा चुका है, बावजूद इसके कुछ नहीं हुआ। कुछ वर्ष पहले जब शहर में ई-रिक्शा शुरू हुए थे तो लोग उन्हें अचरज भरी नजर से देखते थे। आज हालत यह है कि ई-रिक्शा देखते ही शहरवासियों को कोफ्त होने लगती है।

जहां सवारी ने हाथ दिया, वहीं रिक्शा रोक दिया
22 जुलाई को कलेक्टर, पुलिस आयुक्त और निगमायुक्त को व्यक्तिगत रूप से हाई कोर्ट के समक्ष उपस्थित होकर बताना है कि यातायात सुधार के लिए उन्होंने क्या उपाय किए? आदेश को एक सप्ताह होने को आया है, लेकिन मजाल है शहर के यातायात में रत्तीभर भी कोई सुधार हुआ हो। जनप्रतिनिधियों का भी आलम यह है कि रोजाना नई-नई घोषणा कर रहे हैं, लेकिन शायद ही कोई घोषणा मूर्तरूप ले पाती हो। जिम्मेदार अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों की कुंभकर्णीय नींद टूटने का नाम नहीं ले रही है। ई-रिक्शा चालक प्रदूषण न फैलाने के नाम पर मिली छूट का फायदा उठाकर ट्रैफिक को बद से बदतर बना रहे हैं। जहां सवारी ने हाथ दिया, वहीं रिक्शा रोक दिया, चाहे पीछे से आ रहे वाहन चालक दुर्घटना का शिकार ही क्यों न हो जाएं।

पिछले साल 26 रूट तय किए गए थे
राजवाड़ा पर तो मनमर्जी का आलम ये है कि भले ही दो पहिया वाहन को जाने की जगह न मिलें, लेकिन इन्हें अपने वाहन खड़े करने की इतनी जल्दी होती है कि चाहे इनके कारण वाहनों की कतार लग जाए। इन्हें अपनी हिसाब से ही चलना है। पिछले साल प्रशासन ने इन पर सख्ती कर इनके 26 रूट तय किए थे, लेकिन संचालकों के विरोध के बाद सख्ती हवा में उड़ गया। इतना ही नहीं जिला प्रशासन, ट्रैफिक पुलिस व आरटीओ ने भी अपनी जिम्मेदारी से हाथ खीच लिया है। इस अनदेखी का खामियाजा शहर की जनता भुगत रही है। जनता के लिए एक अच्छी सुविधा परेशानी का सबब बन गई है।

Rana Sikander
लेखक / Author

Versatile journalist with experience in conducting in-depth interviews, analyzing complex data, and producing compelling narratives.

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