LIVE गुरुवार, 14 मई 2026
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अध्यात्म

एक ही गोत्र में विवाह क्यों माना जाता है वर्जित? जानिए इसके पीछे की परंपरा और कारण

हिंदू धर्म में विवाह 16 संस्कारों में से एक माना जाता है. विवाह के बाद गृहस्थ जीवन की शुरुआत होती है. हिंदू धर्म में विवाह में कई परंपराएं होती है. विवाह के दौरान कई बातों का ध्यान रखा जाता है. इन्हीं महत्वपूर्ण बातों में शामिल है गोत्र. हिंदू धर्म में कभी भी एक ही गोत्र में विवाह नहीं किया जाता है, लेकिन ऐसा क्यों है? आइए विस्तार से जानते हैं.

गोत्र का शाब्दिक अर्थ होता है वंश या कुल. प्राचीन समय में जो ऋषि-मुनियों के वंशज थे, उनको गोत्रों में बांटा गया था. हर गोत्र का एक मूल ऋषि होता है, जिसके नाम से उस गोत्र की पहचान होती है. उदाहरण के तौर पर कश्यप गोत्र, भारद्वाज गोत्र, गौतम गोत्र. एक गोत्र के लोगों को एक ही पूर्वज का वंशज माना जाता है, इसलिए कहा जाता है कि उनमें खून का रिश्ता यानी रक्त संबंध होता है.

एक गोत्र में विवाह न करने का धार्मिक कारण

एक गोत्र में विवाह न करने के पीछे कारण हैं. हिंदू धर्म ग्रंथों के अनुसार, एक ही गोत्र के लोग भाई-बहन लगते हैं. ऐसा इसलिए क्योंकि उनको एक ही ऋषि का वंशज माना जाता है. ऐसे में एक गोत्र में विवाह ऋषि परंपरा का उल्लंघन माना जाता है. मान्यता है कि एक ही गोत्र में विवाह करने से विवाह दोष होता है, जिससे वर-वधू के जीवन में परेशानियां आती हैं. यही नहीं कहा जाता है कि समान गोत्र में विवाह करने के बाद जो संतान होती है, उसमें शारीरिक और मानसिक रोग होने की संभावना रहती है.

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ये है वैज्ञानिक कारण

विज्ञान ने भी इस बात को माना है कि अगर एक गोत्र में विवाह किया जाता है, तो कई परेशानियां हो सकती हैं. विज्ञान के अनुसार, एक ही गोत्र या कुल में विवाह करने पर संतान में आनुवांशिक दोष हो सकते हैं. ऐसे दंपत्ति की जो संतान होती है, उसमें कुछ नयापन देखने को नहीं मिलता.

Rana Sikander
लेखक: Rana Sikander

Versatile journalist with experience in conducting in-depth interviews, analyzing complex data, and producing compelling narratives.