मलेरिया-मुक्ति की ओर बढ़ रहा है, लेकिन अन्य जिलों में अब भी 5,000 से अधिक मामले सामने आए हैं, जिससे स्वास्थ्य विभाग चिंतित है।
रायपुर। राजधानी रायपुर धीरे-धीरे मलेरिया मुक्त होने की दिशा में अग्रसर है, लेकिन राज्य के अन्य जिलों में स्थिति अभी भी गंभीर बनी हुई है। स्वास्थ्य विभाग की हालिया रिपोर्ट के अनुसार, छत्तीसगढ़ में इस वर्ष अब तक मलेरिया के 5,000 से अधिक मामले सामने आ चुके हैं, जिनमें से अधिकांश केस बस्तर, सरगुजा और कोरिया जैसे आदिवासी बहुल जिलों से हैं।
स्वास्थ्य अधिकारियों का कहना है कि रायपुर में स्वास्थ्य सेवाओं की सुलभता, जागरूकता अभियान और नियमित स्क्रीनिंग के चलते मलेरिया के मामलों में लगातार गिरावट आई है। वहीं दूसरी ओर, दुर्गम और आदिवासी इलाकों में स्वास्थ्य सेवाएं अभी भी पहुंच से दूर हैं, जिससे वहाँ मलेरिया का प्रसार जारी है।
रायपुर में सकारात्मक संकेत
स्वास्थ्य विभाग के अनुसार, रायपुर जिले में इस वर्ष अब तक मलेरिया के गिने-चुने ही मामले सामने आए हैं। विभागीय आंकड़ों से पता चलता है कि राजधानी में पिछले तीन वर्षों से मलेरिया नियंत्रण के लिए विशेष अभियान चलाए जा रहे हैं, जिनमें मच्छरजनित रोगों की रोकथाम हेतु छिड़काव, बुखार शिविर, तथा घर-घर सर्वेक्षण शामिल हैं।
“रायपुर में मलेरिया लगभग समाप्ति की ओर है। यह हमारी स्वास्थ्य टीम, जागरूक नागरिकों और प्रशासन के सहयोग का परिणाम है,” – जिला मुख्य चिकित्सा अधिकारी
अन्य जिलों में स्थिति गंभीर
जबकि राजधानी में स्थिति संतोषजनक है, वहीं राज्य के आदिवासी और सुदूर क्षेत्रों में मलेरिया अब भी एक बड़ी स्वास्थ्य चुनौती बना हुआ है। बस्तर, कांकेर, नारायणपुर, दंतेवाड़ा, सरगुजा और कोरिया जिले मलेरिया से सबसे अधिक प्रभावित हैं। यहां बारिश के मौसम में जलजमाव और मच्छरों की आबादी में तेजी से बढ़ोतरी होती है, जिससे संक्रमण फैलता है।
इन इलाकों में स्वास्थ्य विभाग ने “मलेरिया मुक्त अभियान” (Malaria Mukt Abhiyan) को और तेज करने का निर्णय लिया है। मोबाइल मेडिकल यूनिट्स, ग्रामीण स्वास्थ्य कार्यकर्ता, तथा आशा कार्यकर्ताओं को सक्रिय किया गया है ताकि अधिक से अधिक लोगों की स्क्रीनिंग और इलाज हो सके।
स्वास्थ्य विशेषज्ञों की चेतावनी
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि समय पर सावधानी नहीं बरती गई, तो यह स्थिति और भी गंभीर हो सकती है। कई क्षेत्रों में मलेरिया के गंभीर रूप — जैसे प्लास्मोडियम फाल्सीपेरम — के मामले सामने आ रहे हैं, जो जीवन के लिए खतरा बन सकते हैं।
“ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाओं को और मजबूत करना अनिवार्य है। मलेरिया से निपटने के लिए सिर्फ दवा नहीं, जनसहभागिता भी ज़रूरी है,” – डॉ. राकेश श्रीवास्तव, सार्वजनिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ
सरकार की पहल और चुनौतियाँ
राज्य सरकार द्वारा मलेरिया उन्मूलन को लेकर कई प्रयास किए जा रहे हैं। इसमें मुफ्त मलेरिया जांच किट, घर-घर दवा वितरण, मच्छरदानी वितरण, और स्कूलों में जागरूकता अभियान शामिल हैं। “मलेरिया मुक्त छत्तीसगढ़” मिशन के तहत हर साल हजारों लोगों की स्क्रीनिंग की जाती है।
हालाँकि, दुर्गम इलाकों में जनजातीय आबादी तक स्वास्थ्य सेवाएं पहुँचाना अब भी एक बड़ी चुनौती है। अक्सर बरसात में सड़कों का कटाव और संचार व्यवस्था बाधित होने से दवाएं और चिकित्सा दल समय पर नहीं पहुँच पाते।
जनजागरूकता है सफलता की कुंजी
स्वास्थ्य विभाग अब स्कूलों, पंचायतों, महिला समूहों और एनजीओ के माध्यम से मलेरिया से बचाव को लेकर जनजागरूकता फैला रहा है। मच्छरों के प्रजनन स्थलों को खत्म करने, मच्छरदानी के प्रयोग को बढ़ावा देने, और समय पर जांच करवाने की अपील की जा रही है।
भविष्य की रणनीति
राज्य सरकार ने अगले दो वर्षों में मलेरिया मामलों में 80% तक कमी लाने का लक्ष्य तय किया है। इसके लिए नई तकनीक, जैसे स्मार्ट स्क्रीनिंग उपकरण और ड्रोन आधारित फॉगिंग सिस्टम, अपनाने की योजना है। इसके साथ ही, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों की संख्या बढ़ाने और मोबाइल स्वास्थ्य इकाइयों को सुदृढ़ करने का भी प्रस्ताव है।










