छत्तीसगढ़ के किसान दस तरह के कड़वे पत्तों से प्राकृतिक दवा बनाकर खेती में उपयोग कर रहे हैं। इससे लागत 75% तक घटी और फसलें सुरक्षित रहीं।
रायपुर। छत्तीसगढ़ के किसानों ने प्राकृतिक खेती में एक नई मिसाल कायम की है। प्रदेश के कई हिस्सों में किसान अब दस तरह के कड़वे पत्तों से दवा (काढ़ा/घोल) तैयार कर रहे हैं और इसका उपयोग फसलों पर कर रहे हैं। इससे न केवल फसलें रोगमुक्त और स्वस्थ रह रही हैं बल्कि खेती की लागत में भी लगभग 75 प्रतिशत तक की कमी आई है। यह पहल किसानों को रासायनिक खाद और कीटनाशकों के बोझ से मुक्ति दिलाने में कारगर साबित हो रही है।
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प्राकृतिक खेती की ओर किसानों का झुकाव
पिछले कुछ वर्षों में बढ़ते रासायनिक खाद और कीटनाशकों के दामों ने किसानों की चिंता बढ़ा दी थी। ऐसे में छत्तीसगढ़ के कई प्रगतिशील किसान अब प्राकृतिक खेती को अपना रहे हैं। वे मानते हैं कि प्राकृतिक विधि से खेती न केवल लागत घटाती है बल्कि मिट्टी की उर्वरता भी बरकरार रखती है।
कड़वे पत्तों से बन रही विशेष दवा
किसानों ने बताया कि वे करंज, नीम, धतूरा, आक, बबूल, गिलोय, पपीता, तुलसी, अमरबेल और गुड़हल जैसे पौधों के कड़वे पत्तों को मिलाकर एक विशेष घोल तैयार करते हैं। इस घोल को फसलों पर छिड़काव करने से कीट-पतंगों और रोगों से बचाव होता है। यह एक तरह का प्राकृतिक कीटनाशक है, जो पूरी तरह सुरक्षित और कम लागत वाला है।
लागत में आई भारी कमी
जहां पहले किसान रासायनिक दवाओं पर हजारों रुपये खर्च करते थे, वहीं अब इस घरेलू नुस्खे से लागत में करीब 75% की कमी आई है। किसानों ने बताया कि इस पद्धति से खेती लाभकारी और टिकाऊ बन रही है।
मिट्टी की उर्वरता बनी रहती है
विशेषज्ञों का मानना है कि रासायनिक दवाओं के अधिक प्रयोग से मिट्टी की उर्वरक क्षमता कम हो जाती है। वहीं, कड़वे पत्तों से बनी दवा के इस्तेमाल से मिट्टी की संरचना और उर्वरता दोनों बनी रहती है। इसके अलावा, इससे उत्पन्न फसलें पूरी तरह स्वस्थ और जैविक मानी जाती हैं।
सरकार की पहल और किसानों का उत्साह
राज्य सरकार भी प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने के लिए योजनाएं चला रही है। कृषि विभाग किसानों को प्रशिक्षण और तकनीकी सहयोग उपलब्ध करा रहा है। किसानों का कहना है कि यदि इस पद्धति को बड़े पैमाने पर अपनाया जाए तो छत्तीसगढ़ जैविक खेती का बड़ा केंद्र बन सकता है।
ग्रामीण अंचलों में फैल रहा प्रयोग
यह पहल धीरे-धीरे पूरे छत्तीसगढ़ के ग्रामीण इलाकों में फैल रही है। किसान आपस में अनुभव साझा कर रहे हैं और अधिक से अधिक लोग प्राकृतिक खेती की ओर बढ़ रहे हैं।
पर्यावरण संरक्षण में भी सहायक
प्राकृतिक खेती से न केवल किसानों को लाभ हो रहा है बल्कि यह पर्यावरण संरक्षण में भी सहायक है। रासायनिक कीटनाशकों से होने वाले प्रदूषण से बचाव हो रहा है और जल, मिट्टी व वायु शुद्ध हो रहे हैं।
निष्कर्ष
छत्तीसगढ़ के किसानों की यह पहल अन्य राज्यों के लिए भी प्रेरणादायक है। दस तरह के कड़वे पत्तों से बनी दवा ने साबित कर दिया है कि प्राकृतिक खेती ही टिकाऊ खेती का भविष्य है।








