बलरामपुर के सोनवर्षा गांव में डबरी निर्माण से खेती, मछली पालन और आजीविका को नया सहारा मिला। जल संरक्षण से गांव हुआ आत्मनिर्भर और हराभरा।
रायपुर। छत्तीसगढ़ के बलरामपुर जिले के सोनवर्षा ग्राम पंचायत में ग्रामीणों की मेहनत और सरकार की जल संरक्षण योजनाओं ने मिलकर एक मिसाल पेश की है।
यहाँ डबरी निर्माण (पानी संचयन तालाब) के जरिये न केवल खेती को नया जीवन मिला है, बल्कि ग्रामीणों की आजीविका और पशुपालन को भी स्थिरता प्राप्त हुई है।
सोनवर्षा का यह उदाहरण अब राज्य के अन्य गांवों के लिए एक आदर्श जल-संरक्षण मॉडल बन चुका है।
💧 डबरी निर्माण से सूखाग्रस्त क्षेत्र में आई हरियाली
सोनवर्षा गांव कुछ वर्ष पहले तक बरसात पर निर्भर रहने वाला सूखाग्रस्त क्षेत्र था। गर्मी के मौसम में खेत बंजर हो जाते थे और किसान पलायन के लिए मजबूर हो जाते थे।
लेकिन महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) के तहत बनाई गई डबरी परियोजना ने ग्रामीणों की तकदीर बदल दी।
अब गांव के चारों ओर 20 से अधिक छोटी-बड़ी डबरियाँ बनाई गई हैं, जिनमें वर्षा का पानी संग्रहित होकर पूरे साल किसानों के काम आता है।
इन डबरियों से खेतों की सिंचाई, पशुओं की प्यास बुझाने और मछली पालन तक की व्यवस्था हो गई है।
ग्राम पंचायत सचिव कमलेश बघेल ने बताया —
“पहले किसान धान की एक फसल ही ले पाते थे, लेकिन अब रबी सीजन में भी सब्जी, गेहूं और दलहन की खेती संभव हो गई है। यह बदलाव डबरी निर्माण के कारण ही आया है।”
🌾 खेती को मिला नया जीवन
डबरियों में पानी जमा रहने से खेतों में अब माइक्रो सिंचाई और ड्रिप सिस्टम का उपयोग किया जा रहा है।
किसानों ने बताया कि पहले जहां उत्पादन सीमित था, अब प्रति एकड़ उपज में 25-30% तक की वृद्धि हुई है।
किसान राजेश साहू ने कहा —
“पहले हम साल में केवल एक फसल लेते थे, अब सब्जी, प्याज और चना जैसी दूसरी फसलें भी बो रहे हैं। डबरी का पानी वरदान बन गया है।”
कई किसानों ने डबरी के आसपास मछली पालन और पशुपालन भी शुरू कर दिया है। इससे उनकी अतिरिक्त आय में उल्लेखनीय बढ़ोतरी हुई है।
🐟 मछली पालन से बढ़ी ग्रामीणों की आमदनी
सोनवर्षा की डबरियाँ अब केवल सिंचाई के लिए नहीं, बल्कि आजीविका का नया साधन भी बन चुकी हैं।
ग्रामीणों ने डबरी में रोहू, कतला और मृगल जैसी मछलियों का पालन शुरू किया है।
पिछले वर्ष गांव के युवाओं ने मिलकर 15 डबरियों में सामूहिक मत्स्य पालन किया, जिससे करीब 12 लाख रुपये की आय हुई।
महिला स्व-सहायता समूहों ने भी मछली पालन और सब्जी उत्पादन के कार्य में भागीदारी शुरू की है।
ग्राम की महिला सदस्य सुनीता देवी ने कहा —
“हम पहले घर तक सीमित थे, लेकिन अब मछली पालन से हमें नियमित आय मिल रही है। इससे बच्चों की पढ़ाई और घर की ज़रूरतें पूरी हो रही हैं।”
🌿 जल संरक्षण से बढ़ा पर्यावरण संतुलन
डबरी निर्माण से न केवल खेती और आजीविका सुधरी है, बल्कि पर्यावरण में भी सकारात्मक बदलाव देखने को मिले हैं।
गांव के आसपास भूजल स्तर बढ़ा है और गर्मी के मौसम में भी हैंडपंपों में पर्याप्त पानी मिलता है।
वन क्षेत्र में हरियाली लौटी है और स्थानीय जीव-जंतुओं की संख्या भी बढ़ी है।
पंचायत प्रतिनिधि प्रेमलाल सिंह ने बताया —
“डबरी निर्माण से भूजल स्तर करीब 4-5 फीट तक बढ़ा है। अब गांव में सालभर पानी की कोई कमी नहीं रहती।”
👩🌾 महिलाओं और युवाओं को मिला रोजगार
मनरेगा के तहत डबरी निर्माण कार्यों ने ग्रामीणों को रोजगार के अवसर भी दिए।
गांव के 250 से अधिक मजदूरों को निर्माण अवधि में काम मिला, जिससे उनकी आय में सीधा लाभ हुआ।
महिलाओं ने डबरी किनारे सब्जी बाड़ी, मुर्गी पालन और फूलों की खेती शुरू कर दी है।
युवा किसान राकेश नेताम ने बताया कि वे डबरी से प्राप्त पानी का उपयोग ड्रिप इरिगेशन में कर रहे हैं। उन्होंने टमाटर, गोभी और बैंगन की खेती से इस सीजन में 80 हजार रुपये तक कमाए।
🏗️ डबरी योजना से आत्मनिर्भरता की ओर
मनरेगा और जल जीवन मिशन के संयुक्त प्रयास से सोनवर्षा में बनाई गई डबरियाँ अब आत्मनिर्भरता की मिसाल हैं।
गांव में पानी समितियाँ गठित की गई हैं जो डबरी की देखरेख और जल उपयोग का प्रबंधन करती हैं।
सरपंच सविता कश्यप ने बताया —
“हमने गांव में पानी का उपयोग तय कर दिया है। खेती, पशुपालन और घरेलू ज़रूरतों के लिए अलग-अलग हिस्से चिन्हित हैं। इससे डबरी पूरे साल कारगर बनी रहती है।”
🪶 छत्तीसगढ़ मॉडल के रूप में उभरता सोनवर्षा
राज्य सरकार ने सोनवर्षा ग्राम की सफलता को ‘छत्तीसगढ़ डबरी मॉडल’ के रूप में अपनाने की योजना बनाई है।
खाद्य एवं ग्रामीण विकास विभाग अब इसे अन्य ब्लॉकों — रामानुजगंज, प्रेमनगर और वाड्रफनगर — में लागू करेगा।
उप संचालक ग्रामीण विकास डी.एल. चौहान ने कहा —
“डबरी योजना ने यह साबित किया है कि छोटे जल स्रोत भी बड़े बदलाव ला सकते हैं। यह गांव अब आत्मनिर्भर कृषि का उदाहरण है।”
🌞 मुख्यमंत्री विष्णु देव साय का संदेश
मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय ने हाल ही में कहा था कि जल संरक्षण ही सतत विकास की नींव है।
उन्होंने कहा —
“छत्तीसगढ़ की पहचान अब हरियाली, जल और आत्मनिर्भर गांवों से होगी। सोनवर्षा जैसे प्रयास दिखाते हैं कि सरकार की योजनाएँ जब जनभागीदारी से जुड़ती हैं, तो उनका प्रभाव कई गुना बढ़ जाता है।”
🌾 भविष्य की दिशा
अब ग्रामीणों का लक्ष्य है कि हर घर के पास छोटी डबरी या तालाब हो।
गांव के बच्चों के लिए स्कूल में ‘जल संरक्षण शिक्षा कार्यक्रम’ शुरू किया गया है, ताकि नई पीढ़ी भी इस परंपरा को आगे बढ़ा सके।
सोनवर्षा की सफलता ने साबित कर दिया कि स्थानीय संसाधनों से आत्मनिर्भरता की राह बन सकती है। यह केवल जल प्रबंधन का उदाहरण नहीं, बल्कि ग्रामीण सशक्तिकरण की कहानी है।








