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छत्तीसगढ़

डस्टबिन से उद्योग तक – अंजना उरांव की आत्मनिर्भरता की उड़ान

डस्टबिन से कचरा बीनने वाली अंजना उरांव ने मेहनत और प्रशिक्षण से कचरा प्रबंधन उद्योग खड़ा किया, आत्मनिर्भरता और महिला सशक्तिकरण की मिसाल बनीं।

रायपुर। कभी शहर की गलियों में डस्टबिन से कचरा चुनकर जीवन यापन करने वाली अंजना उरांव आज आत्मनिर्भरता की ऐसी मिसाल बन चुकी हैं, जो न केवल सैकड़ों महिलाओं को प्रेरणा दे रही हैं, बल्कि स्वच्छता और स्वरोजगार के क्षेत्र में नया रास्ता भी दिखा रही हैं। अंजना उरांव की यह यात्रा संघर्ष, संकल्प और स्वावलंबन की सशक्त कहानी है।

संघर्ष से शुरुआत

अंजना उरांव का जीवन शुरुआती दौर में आर्थिक अभावों से भरा रहा। परिवार की जिम्मेदारियों और सीमित संसाधनों के कारण उन्हें कचरा बीनने का काम करना पड़ा। रोज़मर्रा की जरूरतों के लिए डस्टबिन और कचरा स्थलों पर निर्भर रहना उनकी मजबूरी थी। लेकिन कठिन हालात के बीच भी उन्होंने हार नहीं मानी और बेहतर भविष्य का सपना देखती रहीं।

अवसर बना बदलाव की वजह

स्वच्छ भारत मिशन और महिला स्व-सहायता समूहों से जुड़े कार्यक्रमों ने अंजना की जिंदगी को नई दिशा दी। स्थानीय प्रशासन और स्वयंसेवी संगठनों के सहयोग से उन्हें कचरा प्रबंधन, अपशिष्ट पृथक्करण और पुनर्चक्रण (रीसाइक्लिंग) से जुड़ा प्रशिक्षण मिला। यहीं से उन्होंने कचरे को बोझ नहीं, बल्कि संसाधन के रूप में देखना शुरू किया।

छोटे प्रयास से उद्योग तक

प्रशिक्षण के बाद अंजना ने अपने दम पर कचरा संग्रहण और छंटाई का काम शुरू किया। धीरे-धीरे उन्होंने प्लास्टिक, कागज और अन्य पुनर्चक्रण योग्य सामग्री को अलग कर बेचने की व्यवस्था बनाई। मेहनत और अनुभव के साथ उनका यह कार्य एक छोटे उद्यम में बदल गया।

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आज अंजना उरांव एक संगठित यूनिट के रूप में कचरा प्रबंधन और रीसाइक्लिंग का कार्य कर रही हैं। उनके साथ कई अन्य महिलाएं भी जुड़ चुकी हैं, जिन्हें नियमित रोजगार और सम्मानजनक आय मिल रही है।

महिलाओं को मिला नया सहारा

अंजना की पहल ने आसपास की महिलाओं के लिए भी अवसर खोले। उन्होंने स्वयं सहायता समूह के माध्यम से महिलाओं को प्रशिक्षित किया और उन्हें स्वच्छता व पुनर्चक्रण से जुड़े कार्यों से जोड़ा। इससे न केवल महिलाओं की आय बढ़ी, बल्कि उनमें आत्मविश्वास और सामाजिक सम्मान भी विकसित हुआ।

आत्मनिर्भर भारत की जीवंत मिसाल

अंजना उरांव की कहानी आत्मनिर्भर भारत अभियान की जमीनी हकीकत को दर्शाती है। उन्होंने यह साबित कर दिया कि सही मार्गदर्शन, प्रशिक्षण और अवसर मिलने पर कोई भी व्यक्ति अपनी किस्मत बदल सकता है। कचरे से जुड़े काम को उन्होंने सामाजिक कलंक नहीं, बल्कि उद्यमिता का साधन बनाया।

समाज और पर्यावरण को लाभ

उनका कार्य पर्यावरण संरक्षण में भी महत्वपूर्ण योगदान दे रहा है। कचरे के वैज्ञानिक प्रबंधन और पुनर्चक्रण से न केवल शहर की स्वच्छता बेहतर हुई है, बल्कि प्लास्टिक प्रदूषण को कम करने में भी मदद मिली है।

स्थानीय प्रशासन और सामाजिक संगठनों ने अंजना उरांव के प्रयासों की सराहना की है। उन्हें विभिन्न मंचों पर सम्मानित भी किया गया है, ताकि अन्य लोग भी इस तरह के कार्यों के लिए प्रेरित हो सकें।

प्रेरणा बनती कहानी

आज अंजना उरांव केवल एक उद्यमी नहीं, बल्कि संघर्ष से सफलता तक की प्रेरणादायक कहानी बन चुकी हैं। उनकी उड़ान यह संदेश देती है कि हालात चाहे जैसे भी हों, अगर हौसला मजबूत हो तो डस्टबिन से उद्योग तक का सफर भी संभव है।

Heshma lahre
लेखक: Heshma lahre

Heshma lahre is a dedicated journalist at Dabang Awaz, known for her comprehensive coverage across all news categories, delivering accurate and timely reports with integrity.