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मशहूर पंडवानी गायिका तीजन बाई के नाम पर अब सरकारी स्कूल

छत्तीसगढ़ सरकार ने राज्य की कला और संस्कृति को विश्व पटल पर पहचान दिलाने वाली मशहूर पंडवानी गायिका पद्म विभूषण तीजन बाई के सम्मान में एक महत्वपूर्ण निर्णय लिया है। राज्य के मंत्री ने घोषणा की है कि एक सरकारी स्कूल का नाम अब तीजन बाई के नाम पर रखा जाएगा। यह कदम तीजन बाई के कला के क्षेत्र में दिए गए अतुलनीय योगदान को श्रद्धांजलि अर्पित करने और नई पीढ़ी को प्रेरणा देने के उद्देश्य से उठाया गया है। यह घोषणा छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण और संवर्धन के प्रति सरकार की प्रतिबद्धता को दर्शाती है, जिससे स्थानीय कला और कलाकारों को उचित सम्मान मिल सके।

तीजन बाई का अतुलनीय योगदान

तीजन बाई, जिनका जन्म 24 अप्रैल, 1956 को छत्तीसगढ़ के गुंडरदेही में हुआ था, पंडवानी लोक नाट्य शैली की एक ऐसी कलाकार हैं जिन्होंने इसे वैश्विक पहचान दिलाई। उन्होंने महाभारत की कहानियों को अपनी अनूठी शैली, जिसे कपालिक शैली कहा जाता है, में प्रस्तुत कर दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया। उनकी प्रस्तुति में गायन, अभिनय और कथावाचन का अद्भुत मेल होता है, जो श्रोताओं को सीधा महाभारत काल में ले जाता है। उन्होंने न केवल भारत में बल्कि दुनिया भर के कई देशों में पंडवानी का प्रदर्शन किया और लाखों लोगों को इस प्राचीन कला से परिचित कराया। उनकी दमदार आवाज और प्रभावी अभिनय शैली ने उन्हें पंडवानी की पर्याय बना दिया।

उनके असाधारण योगदान को देखते हुए भारत सरकार ने उन्हें कई प्रतिष्ठित पुरस्कारों से सम्मानित किया है। उन्हें 1987 में पद्म श्री, 2003 में पद्म भूषण और 2019 में देश के दूसरे सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्म विभूषण से नवाजा गया। यह सम्मान उन्हें लोक कला के क्षेत्र में उनके आजीवन समर्पण और कड़ी मेहनत के लिए दिया गया। तीजन बाई ने पंडवानी को केवल एक कला शैली के रूप में नहीं देखा, बल्कि इसे अपनी जीवनशैली का हिस्सा बनाया। उनका जीवन कला के प्रति समर्पण और दृढ़ संकल्प का एक जीता-जागता उदाहरण है, जिसने उन्हें ग्रामीण परिवेश से निकलकर अंतरराष्ट्रीय मंचों तक पहुंचाया।

पंडवानी कला और उसका महत्व

पंडवानी छत्तीसगढ़ की एक पारंपरिक लोक नाट्य शैली है, जिसमें महाभारत की कथाओं को एकल कलाकार द्वारा संगीत और अभिनय के साथ प्रस्तुत किया जाता है। ‘पंडवानी’ शब्द ‘पांडव’ और ‘वाणी’ से मिलकर बना है, जिसका अर्थ है पांडवों की कथा। इस कला शैली में कलाकार हाथ में इकतारा या तंबूरा लेकर कहानी सुनाता है, जिसमें बीच-बीच में गायन और अभिनय का भी समावेश होता है। पंडवानी की दो प्रमुख शैलियाँ हैं – वेदामती और कपालिक। जहाँ वेदामती शैली में कलाकार बैठकर कथा सुनाते हैं, वहीं कपालिक शैली में कलाकार खड़े होकर अभिनय और गायन के माध्यम से पूरी कथा को जीवंत करते हैं। तीजन बाई कपालिक शैली की सबसे प्रसिद्ध प्रतिपादक हैं और उन्होंने इसे नई ऊंचाइयों पर पहुंचाया।

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यह कला न केवल मनोरंजन का साधन है बल्कि यह पीढ़ी दर पीढ़ी नैतिक मूल्यों और सांस्कृतिक ज्ञान को हस्तांतरित करने का भी एक माध्यम है। पंडवानी के माध्यम से लोग महाभारत की जटिल कहानियों और उसके पात्रों के जीवन से जुड़े महत्वपूर्ण संदेशों को सरलता से समझते हैं। तीजन बाई ने इस कला को ग्रामीण अंचलों से निकालकर राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय मंचों तक पहुंचाया, जिससे इसकी पहचान और सम्मान में अभूतपूर्व वृद्धि हुई। उनके प्रयासों से पंडवानी को एक नई ऊर्जा और पहचान मिली है, और यह आज भी छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक पहचान का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बनी हुई है। पंडवानी एक जीवंत कला है जो छत्तीसगढ़ की मिट्टी और परंपराओं से गहराई से जुड़ी हुई है।

छत्तीसगढ़ सरकार का सांस्कृतिक सम्मान

छत्तीसगढ़ सरकार का यह फैसला राज्य की कला और संस्कृति को बढ़ावा देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। राज्य सरकार लगातार अपनी समृद्ध लोक कलाओं और कलाकारों को प्रोत्साहित करने के लिए विभिन्न योजनाएं और पहल कर रही है। तीजन बाई के नाम पर स्कूल का नामकरण करना न केवल उन्हें एक कलाकार के रूप में बल्कि एक सांस्कृतिक राजदूत के रूप में भी सम्मानित करता है। यह कदम अन्य कलाकारों को भी अपनी पारंपरिक कलाओं को संरक्षित और बढ़ावा देने के लिए प्रेरित करेगा, जिससे राज्य की सांस्कृतिक धरोहर मजबूत होगी।

ऐसे सम्मान यह सुनिश्चित करते हैं कि भावी पीढ़ियां अपने सांस्कृतिक नायकों और उनकी विरासत से अवगत रहें। यह न केवल एक व्यक्ति का सम्मान है, बल्कि यह उस पूरी कला शैली और उस क्षेत्र की सांस्कृतिक पहचान का भी सम्मान है जिससे वे जुड़े हुए हैं। यह दर्शाता है कि सरकार शिक्षा के साथ-साथ सांस्कृतिक मूल्यों और परंपराओं को भी समान महत्व देती है। यह पहल सांस्कृतिक पर्यटन को भी बढ़ावा दे सकती है, जिससे स्थानीय अर्थव्यवस्था को लाभ होगा और छत्तीसगढ़ की अनूठी पहचान को और मजबूती मिलेगी।

भविष्य की पीढ़ी के लिए प्रेरणा

तीजन बाई के नाम पर सरकारी स्कूल का नामकरण भविष्य की पीढ़ियों के लिए एक स्थायी प्रेरणा स्रोत बनेगा। स्कूल जाने वाले बच्चे और युवा जब अपने संस्थान का नाम एक ऐसी हस्ती के नाम पर देखेंगे, जिन्होंने अपनी कला से देश-विदेश में नाम कमाया है, तो उन्हें अपनी जड़ों और कला के प्रति गर्व महसूस होगा। यह उन्हें अपनी सांस्कृतिक विरासत को समझने और उसे आगे बढ़ाने के लिए प्रोत्साहित करेगा। यह कदम बच्चों को शिक्षा के साथ-साथ कला और संस्कृति के महत्व को भी सिखाएगा, जिससे उनका सर्वांगीण विकास हो सके।

यह पहल उन्हें यह संदेश देगी कि पारंपरिक कलाओं में भी एक सफल और सम्मानित करियर बनाया जा सकता है। तीजन बाई का जीवन संघर्ष, समर्पण और सफलता की कहानी है, जो हर बच्चे के लिए एक आदर्श हो सकती है। इस तरह के सम्मान यह सुनिश्चित करते हैं कि हमारे सांस्कृतिक नायक केवल इतिहास के पन्नों तक सीमित न रहें, बल्कि वे हमारे दैनिक जीवन और संस्थानों का हिस्सा बनें, जिससे उनका प्रभाव हमेशा बना रहे। यह स्कूल भविष्य में तीजन बाई की विरासत को जीवित रखने और नई प्रतिभाओं को पंडवानी कला सीखने और उसमें महारत हासिल करने के लिए प्रेरित करने का एक केंद्र बन सकता है, जिससे छत्तीसगढ़ की लोक कला को नई ऊंचाइयां मिलेंगी।

Dipti Das
लेखक / Author

दीप्ति दास दबंग आवाज़ की संवाददाता हैं, जो विभिन्न विषयों पर सटीक और संतुलित रिपोर्टिंग के लिए जानी जाती हैं।

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