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तांदुला जलाशय से हर खेत तक पानी पहुँचाकर रचा ‘जल क्रांति’ का इतिहास


तांदुला जलाशय से सिंचाई तंत्र के विस्तार ने रायपुर और आसपास के क्षेत्रों में खेती को नई दिशा दी, किसानों की आय दोगुनी होने लगी।


रायपुर। छत्तीसगढ़ की धरती एक बार फिर ‘जल क्रांति’ की मिसाल बन रही है। कभी सूखे और असमय बारिश की मार झेलने वाले किसानों की किस्मत अब बदल रही है। इसका श्रेय जाता है तांदुला जलाशय से जुड़े उस बड़े सिंचाई नेटवर्क को, जिसने गाँव-गाँव तक पानी पहुँचाकर कृषि विकास की नई धारा बहा दी है।

तांदुला जलाशय, जो बलौद जिले में स्थित है, दशकों से क्षेत्र के लिए जीवनरेखा बना हुआ है। लेकिन बीते कुछ वर्षों में राज्य सरकार और स्थानीय प्रशासन के संयुक्त प्रयासों से इसे आधुनिक सिंचाई परियोजना में बदल दिया गया है। इस जलाशय से निकलने वाली नहरों, पाइपलाइन और मिनी सिंचाई योजनाओं ने रायपुर, दुर्ग, बालोद और कवर्धा तक हजारों एकड़ जमीन को उपजाऊ बना दिया है।

जल संसाधन विभाग की पहल
छत्तीसगढ़ जल संसाधन विभाग ने ‘हर खेत तक पानी’ अभियान के तहत तांदुला जलाशय से पानी की आपूर्ति को प्राथमिकता दी। इसके लिए पुरानी नहरों की मरम्मत, नई शाखा नहरों का निर्माण और ड्रिप व स्प्रिंकलर जैसी तकनीक अपनाने पर जोर दिया गया। नतीजा यह हुआ कि अब किसान वर्षभर दो से तीन फसलें लेने लगे हैं।

किसानों की बदली तकदीर
पहले जहाँ किसान सिर्फ धान की खेती तक सीमित थे, वहीं अब वे सब्जी, तिलहन और फल उत्पादन करने लगे हैं। तांदुला परियोजना के कारण पानी की निरंतर उपलब्धता ने फसल चक्र में विविधता लाई है। रायपुर जिले के तिल्दा और आरंग क्षेत्र के किसान बताते हैं कि अब उन्हें सिंचाई की चिंता नहीं रहती। समय पर पानी मिलने से उत्पादन बढ़ा और बाजार में अच्छी कीमत मिली।

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तकनीकी नवाचार से सशक्त हुई व्यवस्था
सिंचाई व्यवस्था में पारदर्शिता और दक्षता लाने के लिए ‘रीयल टाइम वाटर मॉनिटरिंग सिस्टम’ भी लागू किया गया है। इससे यह पता चलता है कि किस क्षेत्र में कितनी मात्रा में पानी पहुँचा है और कितने खेतों को सिंचाई मिली। यह सिस्टम किसानों को मोबाइल ऐप के माध्यम से भी जानकारी देता है, जिससे वे अपनी खेती की योजना बेहतर बना पाते हैं।

पर्यावरण और भूजल संरक्षण का नया अध्याय
तांदुला जलाशय परियोजना का सबसे बड़ा योगदान यह है कि इससे भूजल स्तर में स्थिरता आई है। पहले जहाँ ट्यूबवेलों पर निर्भरता बढ़ रही थी, अब सतही सिंचाई के कारण भूमिगत जल का दोहन घटा है। साथ ही, खेत तालाब, चेकडैम और रेन वाटर हार्वेस्टिंग जैसे उपायों से जल संरक्षण को नई गति मिली है।

महिलाओं की भागीदारी में बढ़ोतरी
‘जल क्रांति’ के इस अभियान में ग्रामीण महिला स्व-सहायता समूहों की भूमिका भी उल्लेखनीय है। उन्होंने सिंचाई तंत्र की निगरानी, नहर सफाई और जल उपयोग प्रबंधन में सक्रिय योगदान दिया है। इससे न केवल महिलाओं की आर्थिक स्थिति में सुधार आया है, बल्कि ग्रामीण समाज में उनका नेतृत्व भी मजबूत हुआ है।

राज्य सरकार की भविष्य योजना
छत्तीसगढ़ सरकार अब इस सफलता को मॉडल के रूप में लेकर अन्य जलाशयों तक विस्तार करने की तैयारी में है। योजना है कि आने वाले दो वर्षों में प्रदेश के हर जिले में ‘माइक्रो इरिगेशन नेटवर्क’ स्थापित किया जाए। इससे लगभग 10 लाख हेक्टेयर कृषि भूमि को सिंचाई सुविधा से जोड़ा जा सकेगा।

कृषि विशेषज्ञों की राय
कृषि वैज्ञानिकों का मानना है कि तांदुला जलाशय परियोजना सिर्फ एक जल योजना नहीं, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था के पुनरुत्थान की कहानी है। उन्होंने सुझाव दिया कि अगर इसी तरह जल प्रबंधन को स्थानीय जरूरतों के अनुरूप लागू किया गया, तो छत्तीसगढ़ देश में ‘वाटर इफिशिएंट एग्रीकल्चर’ का अग्रणी राज्य बन सकता है।

किसानों की आवाज़
स्थानीय किसान रामलाल साहू बताते हैं—“पहले बारिश पर निर्भर रहते थे, अब हर खेत में पानी पहुँचता है। हमारी आय दोगुनी हो गई है।” वहीं महिला किसान संगीता यादव का कहना है—“अब हम टमाटर, मिर्च और भिंडी जैसी नकदी फसलें भी उगा पा रहे हैं, जिससे घर की आर्थिक स्थिति सुधरी है।”

निष्कर्षतः
तांदुला जलाशय से जुड़ा यह अभियान न केवल सिंचाई व्यवस्था का विस्तार है, बल्कि यह ग्रामीण आत्मनिर्भरता और सतत विकास का उदाहरण भी है। यह दिखाता है कि जब जल संसाधनों का वैज्ञानिक प्रबंधन होता है, तो खेती समृद्ध होती है, किसान सशक्त होता है और प्रदेश की अर्थव्यवस्था भी आगे बढ़ती है। रायपुर और आसपास के इलाकों में हर खेत तक पानी पहुँचाने का यह प्रयास आने वाले समय में ‘जल क्रांति’ की स्थायी कहानी बनकर उभरेगा।

Heshma lahre
लेखक / Author

Heshma lahre is a dedicated journalist at Dabang Awaz, known for her comprehensive coverage across all news categories, delivering accurate and timely reports with integrity.

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