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LPG से कितनी सस्ती पड़ेगी DME गैस? संकट के बीच भारत का देसी जुगाड़ कितना कारगर?

नई दिल्ली

ईरान, इजरायल और अमेरिका के बीच गहराते युद्ध के बीच वैश्विक स्तर पर ईंधन की सप्लाई चेन पूरी तरह चरमरा गई है. इस महायुद्ध की आशंका के बीच रसोई गैस (LPG) की कीमतों में लगी आग और गैस की किल्लत के दावों ने आम आदमी का बजट बिगाड़ दिया है. ऐसे में पुणे के वैज्ञानिकों ने एक ऐसा देसी जुगाड़ यानी DME गैस तैयार की है, जो न केवल सस्ती है बल्कि संकट के समय भारत को आत्मनिर्भर बनाने की ताकत भी रखती है. आइए जानें कि यह कितने काम की है और कैसे एलपीजी का बेहतर ऑप्शन बन सकती है।

युद्ध के साये में एलपीजी का विकल्प
दुनिया भर में जारी युद्ध की वजह से प्राकृतिक गैस की आपूर्ति पर बुरा असर पड़ा है. ईरान और अमेरिका के बीच बढ़ते तनाव ने भारत जैसे देशों की चिंता बढ़ा दी है, क्योंकि हम अपनी गैस जरूरतों के लिए काफी हद तक आयात पर निर्भर हैं. इसी संकट के बीच पुणे स्थित सीएसआईआर-राष्ट्रीय रासायनिक प्रयोगशाला (NCL) के वैज्ञानिकों ने डाइमिथाइल ईथर (DME) के रूप में एक क्रांतिकारी समाधान पेश किया है. यह गैस एलपीजी की तरह ही काम करती है और आने वाले समय में रसोई गैस की किल्लत को खत्म कर सकती है।

क्या है डाइमिथाइल ईथर और इसके गुण?
डाइमिथाइल ईथर यानी DME एक ऐसा ईंधन है, जिसके गुणधर्म काफी हद तक एलपीजी से मिलते-जुलते हैं. वैज्ञानिकों का दावा है कि यह गैस एलपीजी की तरह ही सुरक्षित तरीके से जलती है और मौजूदा कुकिंग इंफ्रास्ट्रक्चर के साथ पूरी तरह संगत है. इसका सबसे बड़ा फायदा यह है कि इसे चलाने के लिए आपको अपने घर के चूल्हे या सिलेंडर में किसी भी तरह के बदलाव की जरूरत नहीं पड़ेगी. यह मौजूदा सिस्टम में फिट होकर उतनी ही ऊर्जा प्रदान करती है जितनी सामान्य रसोई गैस देती है।

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दो दशकों की मेहनत का शानदार नतीजा
पुणे के वैज्ञानिकों ने पिछले 20 वर्षों के कड़े शोध के बाद इस खास फॉर्मूले को तैयार किया है. फिलहाल एक पायलट प्रोजेक्ट के तहत रोजाना 250 किलो गैस का उत्पादन किया जा रहा है. वैज्ञानिकों की इस सफलता ने भारत को उन चुनिंदा देशों की कतार में खड़ा कर दिया है, जिनके पास ईंधन का अपना वैकल्पिक और सस्ता विज्ञान मौजूद है. यह तकनीक पूरी तरह स्वदेशी है, जो मेक इन इंडिया अभियान को भी मजबूती देती है।

विदेशी मुद्रा भंडार को मिलेगी संजीवनी
भारत अपनी जरूरत की एलपीजी का एक बड़ा हिस्सा विदेशों से खरीदता है, जिसके लिए भारी मात्रा में विदेशी मुद्रा चुकानी पड़ती है. शोध के अनुसार, यदि एलपीजी में केवल 8% DME गैस मिला दी जाए, तो देश को हर साल लगभग 9,500 करोड़ रुपये की विदेशी मुद्रा की बचत हो सकती है. युद्ध के कारण डॉलर के मुकाबले गिरते रुपये और बढ़ती तेल कीमतों के बीच यह बचत भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए किसी वरदान से कम नहीं होगी।

कितनी सस्ती और कितनी कारगर है यह गैस?
DME गैस एलपीजी की तुलना में काफी सस्ती पड़ने वाली है, क्योंकि इसे भारत में ही उपलब्ध कोयले या बायोमास (जैविक कचरे) से तैयार किया जा सकता है. वर्तमान शोध बताते हैं कि एलपीजी के साथ 20% तक DME मिलाकर इस्तेमाल करना पूरी तरह सफल रहा है. हालांकि, शुरुआत में इसे 8% की मिलावट के साथ बाजार में उतारने की तैयारी है. घरेलू स्रोतों से तैयार होने के कारण इसकी उत्पादन लागत कम है, जिसका सीधा फायदा आम उपभोक्ताओं की जेब को मिलेगा।

पर्यावरण के लिहाज से भी बेहतर विकल्प
महंगाई कम करने के साथ-साथ DME गैस पर्यावरण के लिए भी एक वरदान साबित हो सकती है. एलपीजी की तुलना में यह गैस जलने पर बहुत कम प्रदूषण फैलाती है. इसमें हानिकारक कणों का उत्सर्जन न्यूनतम होता है, जिससे यह एक क्लीन फ्यूल की श्रेणी में आती है. आज जब पूरी दुनिया नेट-जीरो और प्रदूषण मुक्त ईंधन की बात कर रही है, तब भारत का यह देसी जुगाड़ वैश्विक मानकों पर भी खरा उतरता नजर आ रहा है।

औद्योगिक उत्पादन और भविष्य की राह
वैज्ञानिकों का कहना है कि यदि बड़ी औद्योगिक कंपनियां इस तकनीक को अपनाती हैं और बड़े पैमाने पर इसका उत्पादन शुरू होता है, तो एलपीजी पर निर्भरता काफी हद तक खत्म हो सकती है. पायलट प्रोजेक्ट की सफलता ने रास्ता साफ कर दिया है. अब जरूरत है इसे लैब से निकालकर आम जनता तक पहुंचाने की. युद्ध के इस दौर में जहां ऊर्जा सुरक्षा सबसे बड़ी चुनौती है, वहां DME गैस भारत के लिए एक मजबूत ढाल साबित हो सकती है।

Rana Sikander
लेखक / Author

Versatile journalist with experience in conducting in-depth interviews, analyzing complex data, and producing compelling narratives.

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