कोंडागांव जिले में कृषि विज्ञान केंद्र के नवाचार से कसावा की खेती को बढ़ावा, किसानों को कम लागत में अधिक लाभ और वैकल्पिक फसल का विकल्प मिला।
कोंडागांव। कृषि में नवाचार को बढ़ावा देने की दिशा में कोंडागांव जिले के कृषि विज्ञान केंद्र (केवीके) द्वारा कसावा (टैपिओका) की खेती का सफल प्रयोग किया जा रहा है। इस नई पहल से जिले के किसानों को पारंपरिक फसलों के विकल्प के रूप में अधिक लाभकारी खेती अपनाने का अवसर मिल रहा है।
कसावा: कम लागत, अधिक लाभ
कृषि वैज्ञानिकों ने बताया कि कसावा एक ऐसी फसल है, जो कम पानी, कम देखरेख और मध्यम भूमि में भी अच्छी उपज देती है। यह फसल बदलते मौसम और जलवायु परिस्थितियों के अनुकूल है, जिससे आदिवासी और वर्षा आधारित खेती करने वाले किसानों के लिए यह विशेष रूप से लाभकारी साबित हो सकती है।
कृषि विज्ञान केंद्र का मार्गदर्शन
कृषि विज्ञान केंद्र कोंडागांव द्वारा चयनित किसानों के खेतों में कसावा की खेती का प्रदर्शन प्लॉट तैयार किया गया है। वैज्ञानिकों ने किसानों को बीज रोपण, खाद प्रबंधन, सिंचाई, रोग नियंत्रण और कटाई से जुड़ी तकनीकी जानकारी दी।
औद्योगिक और खाद्य उपयोग
विशेषज्ञों के अनुसार कसावा का उपयोग खाद्य पदार्थों के साथ-साथ स्टार्च, सागो, पशु आहार और औद्योगिक उत्पादों में भी होता है। इससे किसानों को बेहतर बाजार और उचित मूल्य मिलने की संभावना बढ़ जाती है।
किसानों में बढ़ता उत्साह
कसावा की खेती को लेकर किसानों में उत्साह देखने को मिल रहा है। कई किसानों ने आने वाले सीजन में इस फसल को अपनाने की इच्छा जताई है। किसानों का कहना है कि यदि बाजार और विपणन की व्यवस्था सुनिश्चित होती है, तो यह फसल उनकी आय बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।
आदिवासी अंचल के लिए नई संभावना
कोंडागांव आदिवासी बहुल जिला है, जहां परंपरागत खेती सीमित संसाधनों पर आधारित है। कसावा जैसी फसल यहां के किसानों के लिए स्थायी और सुरक्षित आय का माध्यम बन सकती है।
भविष्य की योजना
कृषि विज्ञान केंद्र के अधिकारियों ने बताया कि भविष्य में कसावा की खेती को और अधिक किसानों तक पहुंचाने के लिए प्रशिक्षण, बीज वितरण और तकनीकी सहायता प्रदान की जाएगी।
यह नवाचार कोंडागांव जिले में कृषि विविधीकरण और किसानों की आय वृद्धि की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।








