मनरेगा की डबरी से जल संरक्षण मजबूत, ग्रामीणों को सिंचाई, पशुपालन और मत्स्य पालन से अतिरिक्त आय और रोजगार के अवसर मिले।
रायपुर। छत्तीसगढ़ में जल संरक्षण के प्रयासों ने ग्रामीण आजीविका को नई दिशा दी है। महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) के तहत निर्मित डबरी अब केवल जल संग्रहण का साधन नहीं रह गई है, बल्कि यह ग्रामीण परिवारों के लिए आय संवर्धन का प्रभावी माध्यम बनकर उभर रही है।
राज्य के कई ग्रामीण क्षेत्रों में मनरेगा के अंतर्गत खेतों और ग्राम परिसरों में डबरी का निर्माण किया गया है। इन डबरियों में वर्षा जल का संग्रह होने से किसानों को सिंचाई, पशुपालन और मत्स्य पालन जैसी गतिविधियों में निरंतर जल उपलब्ध हो रहा है। इससे कृषि उत्पादन में सुधार हुआ है और अतिरिक्त आय के अवसर पैदा हुए हैं।
ग्रामीणों का कहना है कि डबरी बनने से पहले जहां उन्हें सिंचाई और पशुओं के लिए पानी की समस्या का सामना करना पड़ता था, वहीं अब वे सब्जी उत्पादन, फसल विविधीकरण और मछली पालन जैसी गतिविधियों से आमदनी बढ़ा रहे हैं। इससे उनकी आर्थिक स्थिति में सुधार आया है और रोजगार के लिए पलायन भी कम हुआ है।
प्रशासनिक अधिकारियों के अनुसार, मनरेगा के तहत जल संरक्षण से जुड़े कार्यों को प्राथमिकता दी जा रही है। डबरी निर्माण से भूजल स्तर में वृद्धि हुई है और जल संकट से जूझ रहे क्षेत्रों को राहत मिली है। साथ ही, इन कार्यों से ग्रामीणों को स्थानीय स्तर पर रोजगार भी मिला है।
महिला स्व-सहायता समूहों की भूमिका भी इस पहल में महत्वपूर्ण रही है। महिलाएं डबरी के आसपास सब्जी बाड़ी, पौधरोपण और मत्स्य गतिविधियों से जुड़कर आत्मनिर्भर बन रही हैं। इससे महिला सशक्तिकरण को भी बढ़ावा मिला है।
विशेषज्ञों का मानना है कि जल संरक्षण और आजीविका का यह समन्वय सतत विकास का प्रभावी मॉडल है। मनरेगा की डबरी जैसे छोटे प्रयास दीर्घकाल में बड़े सामाजिक और आर्थिक लाभ दे रहे हैं।
कुल मिलाकर, जल संरक्षण से बढ़ा आजीविका का यह दायरा ग्रामीण छत्तीसगढ़ में आत्मनिर्भरता और समृद्धि की नई कहानी लिख रहा है।








