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उत्कृष्ट आदिवासी नेता बाबा कार्तिक उरांव जीवन समर्पित कर जनजातीय समाज के उत्थान हेतु संघर्षरत रहे — विष्णु देव साय।

मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने कहा कि बाबा कार्तिक उरांव ने शिक्षा, समानता और सामाजिक न्याय के लिए अपना जीवन जनजातीय समाज के उत्थान हेतु समर्पित किया।

रायपुर। छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय ने कहा कि बाबा कार्तिक उरांव ने अपने जीवन का प्रत्येक क्षण जनजातीय समाज के उत्थान और उसके अधिकारों की रक्षा के लिए समर्पित किया। वे न केवल एक जनसेवक थे, बल्कि आदिवासी अस्मिता के प्रतीक भी थे, जिन्होंने शिक्षा, संस्कृति और आत्मसम्मान के क्षेत्र में आदिवासी समाज को नई दिशा दी।

मुख्यमंत्री साय ने यह बातें रायपुर में आयोजित एक श्रद्धांजलि समारोह में कही, जहाँ बाबा कार्तिक उरांव की जयंती के अवसर पर अनेक जनजातीय प्रतिनिधि, सामाजिक कार्यकर्ता और विद्यार्थी उपस्थित थे।


बाबा कार्तिक उरांव: शिक्षा और समाज सुधार के अग्रदूत

बाबा कार्तिक उरांव का जन्म 29 अक्टूबर 1924 को झारखंड के गुमला जिले के लिटाटोली गाँव में हुआ था। सीमित संसाधनों के बावजूद उन्होंने उच्च शिक्षा प्राप्त की और इंजीनियरिंग में डिग्री हासिल की। वे उन कुछ प्रारंभिक आदिवासी नेताओं में से थे जिन्होंने इंग्लैंड जाकर तकनीकी शिक्षा प्राप्त की थी।

मुख्यमंत्री साय ने कहा, “बाबा कार्तिक उरांव ने यह दिखाया कि शिक्षा ही सशक्तिकरण की सबसे बड़ी कुंजी है। उन्होंने अपने जीवन से यह सिद्ध किया कि शिक्षा के माध्यम से समाज को उन्नति की ओर ले जाया जा सकता है।”

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राजनीति में प्रवेश और आदिवासी हक की लड़ाई

कार्तिक उरांव ने भारतीय राजनीति में एक मिसाल कायम की। वे तीन बार लोकसभा सांसद रहे और केंद्र सरकार में मंत्री पद पर भी कार्यरत रहे। संसद के भीतर उन्होंने हमेशा जनजातीय समाज के हक, पहचान और आरक्षण की रक्षा के लिए आवाज उठाई।

उन्होंने 1970 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को एक ज्ञापन सौंपा, जिसमें 300 से अधिक सांसदों ने हस्ताक्षर किए थे। इसमें उन्होंने यह मांग रखी थी कि जो व्यक्ति अपनी पारंपरिक जनजातीय संस्कृति, आस्था और धर्म छोड़ देता है, उसे अनुसूचित जनजाति के आरक्षण का लाभ नहीं मिलना चाहिए।

मुख्यमंत्री साय ने कहा, “उनकी दूरदर्शिता आज भी हमारे नीति-निर्माण में मार्गदर्शक है। उन्होंने समाज में समानता, स्वाभिमान और पहचान के लिए जो संघर्ष किया, वह आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का स्रोत है।”


‘बीस वर्ष की काली रात’ – समाज की पीड़ा का दस्तावेज़

बाबा कार्तिक उरांव न केवल एक राजनेता बल्कि एक संवेदनशील लेखक भी थे। उनकी प्रसिद्ध पुस्तक ‘बीस वर्ष की काली रात’ में उन्होंने आदिवासी समाज के संघर्ष, उपेक्षा और दर्द को आवाज दी। इस ग्रंथ ने नीति-निर्माताओं को यह सोचने पर मजबूर किया कि देश के विकास में आदिवासी समाज को मुख्यधारा से कैसे जोड़ा जाए।

उनका यह संदेश आज भी प्रासंगिक है कि विकास तभी सार्थक होगा जब समाज के अंतिम व्यक्ति तक न्याय और अवसर पहुंचे।


मुख्यमंत्री विष्णु देव साय का संदेश: “उनका अधूरा सपना हमें पूरा करना है”

रायपुर में आयोजित समारोह में मुख्यमंत्री साय ने कहा कि बाबा कार्तिक उरांव का सपना था – “शिक्षित, सशक्त और स्वाभिमानी आदिवासी समाज”। उन्होंने जनजातीय समाज को यह संदेश दिया कि अपनी संस्कृति और परंपरा को अपनाना ही उनकी असली पहचान है।

मुख्यमंत्री ने कहा,

“आज जब हम आदिवासी विकास की बात करते हैं, तब बाबा कार्तिक उरांव का नाम सबसे पहले आता है। उन्होंने जो नींव रखी थी, उसी पर आज हमारा समाज खड़ा है। अब हमें उनका अधूरा सपना पूरा करना है — हर आदिवासी बच्चे तक शिक्षा, स्वास्थ्य और सम्मान पहुंचाना है।”

उन्होंने यह भी कहा कि छत्तीसगढ़ सरकार जनजातीय क्षेत्रों के विकास के लिए निरंतर प्रयासरत है। राज्य में आदिवासी युवाओं के लिए शिक्षा, रोजगार, स्वरोजगार और उद्यमिता के क्षेत्र में अनेक योजनाएँ संचालित की जा रही हैं।


संस्कृति और पहचान की रक्षा में उनका योगदान

बाबा कार्तिक उरांव का मानना था कि संस्कृति ही किसी समाज की आत्मा होती है। उन्होंने हमेशा यह कहा कि यदि कोई समाज अपनी परंपराओं को भूल जाता है, तो उसकी पहचान मिट जाती है। इसीलिए उन्होंने आदिवासी भाषाओं, नृत्य, संगीत और पारंपरिक ज्ञान को संरक्षित करने पर जोर दिया।

मुख्यमंत्री साय ने कहा कि राज्य सरकार भी इसी दिशा में काम कर रही है। जनजातीय संग्रहालयों, लोककला केंद्रों और सांस्कृतिक उत्सवों के माध्यम से आदिवासी संस्कृति को संरक्षित और प्रोत्साहित किया जा रहा है।


बाबा कार्तिक उरांव की विरासत और आज की प्रासंगिकता

आज के समय में जब समाज तेजी से आधुनिकता की ओर बढ़ रहा है, तब भी बाबा कार्तिक उरांव की विचारधारा पहले से अधिक प्रासंगिक हो गई है। उनका संदेश था — “आधुनिक बनो, पर अपनी जड़ों से जुड़े रहो।”

मुख्यमंत्री साय ने अपने भाषण में कहा कि उनके विचार आज भी जनजातीय नीति निर्धारण के केंद्र में हैं। उनकी सोच ही है जिसने “समावेशी विकास” की अवधारणा को मजबूत किया।


समापन: प्रेरणा के दीप बने रहेंगे बाबा कार्तिक उरांव

कार्यक्रम के अंत में मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने बाबा कार्तिक उरांव की प्रतिमा पर पुष्प अर्पित करते हुए कहा,

“वे केवल झारखंड या छत्तीसगढ़ के नहीं, बल्कि पूरे भारत के आदिवासी समाज के गौरव हैं। उन्होंने जो मशाल जलाई थी, वह आने वाली पीढ़ियों के मार्ग को आलोकित करती रहेगी।”

उन्होंने उपस्थित युवाओं से आह्वान किया कि वे शिक्षा, सेवा और संस्कृति के मार्ग पर चलकर बाबा कार्तिक उरांव के सपनों को साकार करें।


निष्कर्ष:
बाबा कार्तिक उरांव का जीवन त्याग, समर्पण और संघर्ष की मिसाल है। उन्होंने दिखाया कि सच्चा नेतृत्व वही है जो समाज के सबसे कमजोर वर्ग को भी सशक्त बना सके। मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के शब्दों में — “बाबा कार्तिक उरांव का जीवन हमें यह सिखाता है कि जब उद्देश्य समाज सेवा हो, तो संघर्ष भी प्रेरणा बन जाता है।”


Heshma lahre
लेखक / Author

Heshma lahre is a dedicated journalist at Dabang Awaz, known for her comprehensive coverage across all news categories, delivering accurate and timely reports with integrity.

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