छत्तीसगढ़ की लोकसंस्कृति ने बर्लिन में आयोजित अंतरराष्ट्रीय सांस्कृतिक उत्सव में दुनिया का दिल जीता, लोकनृत्य, हस्तशिल्प और संगीत ने बिखेरा भारतीय परंपरा का रंग।
रायपुर। छत्तीसगढ़ की समृद्ध लोकसंस्कृति और परंपराओं ने एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय मंच पर अपनी छाप छोड़ी है। हाल ही में आयोजित “इंडिया कल्चरल फेस्ट 2025” में छत्तीसगढ़ के लोक कलाकारों ने अपनी मनमोहक प्रस्तुतियों से विदेशों में भारत की सांस्कृतिक पहचान को नई ऊंचाई दी। छत्तीसगढ़ की पारंपरिक वेशभूषा, लोकनृत्य, लोकगीत और जनजातीय कलाओं ने दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया।
यह आयोजन यूरोप के बर्लिन शहर में हुआ, जहां भारत के विभिन्न राज्यों से कलाकारों ने भाग लिया। लेकिन सबसे ज्यादा सराहना छत्तीसगढ़ की टीम को मिली, जिसने राज्य के लोकजीवन, आदिवासी संस्कृति और रंग-बिरंगी परंपराओं को मंच पर जीवंत कर दिया।
लोकनृत्य “पंथी” और “राऊत नाचा” बना आकर्षण का केंद्र
कार्यक्रम में छत्तीसगढ़ की प्रसिद्ध लोकनृत्य प्रस्तुतियाँ — पंथी नृत्य, राऊत नाचा, और सुआ नृत्य — ने विदेशी दर्शकों को झूमने पर मजबूर कर दिया। कलाकारों ने “जय सतनाम” की धुन पर जब पंथी नृत्य प्रस्तुत किया तो पूरा सभागार तालियों से गूंज उठा। वहीं, राऊत नाचा की ऊर्जा और तालबद्धता ने भारतीय ग्रामीण जीवन का जीवंत चित्र प्रस्तुत किया।
विदेशी दर्शक न केवल प्रस्तुति से प्रभावित हुए, बल्कि उन्होंने कलाकारों से उनकी वेशभूषा, वाद्ययंत्र और परंपराओं के बारे में विस्तार से जाना। कार्यक्रम के दौरान छत्तीसगढ़ी लोकवाद्य “मृदंग”, “ढोलक”, “मोहर सिंह”, “मांदर” और “बांसुरी” की ध्वनियों ने पूरे माहौल को लोकसुगंध से भर दिया।
छत्तीसगढ़ी कला और हस्तशिल्प की भी प्रदर्शनी
सांस्कृतिक प्रस्तुतियों के साथ ही छत्तीसगढ़ की हस्तशिल्प और जनजातीय कला की प्रदर्शनी ने भी अंतरराष्ट्रीय आगंतुकों को आकर्षित किया। “बस्तर धातु कला” और “कोसा सिल्क” के स्टॉल पर विदेशी पर्यटकों की भीड़ लगी रही। बस्तर की धातु मूर्तियां और नारायणपुर की लकड़ी की नक्काशी को विशेष सराहना मिली।
छत्तीसगढ़ संस्कृति विभाग की ओर से भेजे गए शिल्पकारों ने बताया कि यह प्रदर्शन न केवल व्यापारिक दृष्टि से उपयोगी रहा, बल्कि इससे राज्य की पारंपरिक कला को वैश्विक पहचान मिली।
महिलाओं की भागीदारी ने दी नई पहचान
इस बार छत्तीसगढ़ की टीम में महिलाओं की भागीदारी भी उल्लेखनीय रही। सुकमा और कांकेर जिलों से आई महिला कलाकारों ने पारंपरिक “सुआ नृत्य” प्रस्तुत किया, जो मातृत्व, प्रकृति और सामूहिक एकता का प्रतीक है। महिला कलाकारों ने बताया कि उन्हें यह मंच केवल नृत्य प्रदर्शन का नहीं, बल्कि अपनी संस्कृति को दुनिया के सामने प्रस्तुत करने का अवसर भी मिला।
मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने दी बधाई
मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय ने छत्तीसगढ़ी दल को बधाई देते हुए कहा कि यह राज्य के लिए गर्व का क्षण है। उन्होंने कहा,
“छत्तीसगढ़ की संस्कृति हमारी आत्मा है। इसे वैश्विक स्तर पर सम्मान मिलना हमारे समाज की सांस्कृतिक जीवंतता और समृद्ध परंपरा का प्रमाण है।”
मुख्यमंत्री ने यह भी कहा कि सरकार भविष्य में कलाकारों को और अधिक अंतरराष्ट्रीय अवसर उपलब्ध कराएगी, ताकि वे अपनी प्रतिभा को दुनिया के मंच पर प्रदर्शित कर सकें।
विदेशी दर्शकों का उत्साह
कार्यक्रम में उपस्थित विदेशी मेहमानों ने छत्तीसगढ़ी लोकनृत्य और संगीत को “वाइब्रेंट” और “स्पिरिचुअल” बताया। एक जर्मन दर्शक ने कहा, “छत्तीसगढ़ के नृत्य में सिर्फ ताल नहीं, बल्कि एक कहानी और भावना है — जो दिल को छू जाती है।”
भारत के दूतावास के सांस्कृतिक अधिकारी ने बताया कि छत्तीसगढ़ की टीम ने भारत की सांस्कृतिक विविधता को सुंदरता से प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि ऐसे आयोजनों से भारत की ‘एक भारत, श्रेष्ठ भारत’ की भावना को अंतरराष्ट्रीय मंच पर मजबूती मिलती है।
छत्तीसगढ़ की संस्कृति को मिले वैश्विक अवसर
संस्कृति विभाग के अधिकारियों ने बताया कि यह विदेश प्रदर्शन केवल सांस्कृतिक आदान-प्रदान नहीं, बल्कि “कलात्मक आर्थिक सशक्तिकरण” का भी माध्यम है। इस कार्यक्रम में कलाकारों को अपने उत्पाद और कलाकृतियां बेचने का अवसर भी मिला।
राज्य सरकार ने घोषणा की है कि 2026 तक हर साल कम से कम दो विदेशी सांस्कृतिक दौरों में छत्तीसगढ़ के कलाकारों को भेजा जाएगा। इससे उन्हें वैश्विक अनुभव के साथ नई संभावनाओं के द्वार खुलेंगे।
लोककला से आत्मनिर्भरता की ओर
सांस्कृतिक विशेषज्ञों का मानना है कि छत्तीसगढ़ की लोककला केवल मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि यह ग्रामीण अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा है। लोकनृत्य, संगीत और हस्तशिल्प के माध्यम से हजारों परिवारों को रोजगार मिलता है।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इसकी पहचान बनने से इन कलाकारों की आजीविका को भी स्थिरता मिलेगी।
संस्कृति के रंग में सजा छत्तीसगढ़ का नाम
यह आयोजन इस बात का प्रमाण है कि छत्तीसगढ़ न केवल खनिज और प्राकृतिक संपदा में समृद्ध है, बल्कि इसकी सांस्कृतिक धरोहर भी विश्वस्तर पर पहचान बना रही है। राज्य के कलाकारों की यह यात्रा उस सोच का प्रतीक है, जो “स्थानीय से वैश्विक” की दिशा में निरंतर अग्रसर है।
विदेशी धरती पर छत्तीसगढ़ की लोकधुनों, नृत्यों और कलाओं की गूंज ने यह साबित कर दिया कि भारत की सांस्कृतिक आत्मा केवल किताबों या इतिहास में नहीं, बल्कि आज भी जीवंत है — और वह दुनिया को जोड़ने की शक्ति रखती है।








