कांकेर जिले के डेढ़कोहका जंगल में 70-80 पेड़ अवैध रूप से काटे गए, ग्रामीणों ने दोषियों पर सख्त कार्रवाई और निगरानी बढ़ाने की मांग की।
कांकेर। छत्तीसगढ़ के कांकेर जिले में एक बार फिर जंगलों की सुरक्षा पर सवाल खड़े हो गए हैं। जिले के डेढ़कोहका वन क्षेत्र में अवैध कटाई का बड़ा मामला सामने आया है। वन विभाग की टीम ने मौके पर लगभग 70 से 80 पेड़ों के अवशेष बरामद किए हैं। ये सभी पेड़ बिना अनुमति काटे गए थे।
इस घटना से न केवल पर्यावरण प्रेमियों में आक्रोश है बल्कि स्थानीय ग्रामीणों ने भी आरोप लगाया है कि लगातार हो रही अवैध कटाई के बावजूद विभाग की निगरानी में लापरवाही बरती जा रही है।
🌲 डेढ़कोहका जंगल में वन संपदा पर हमला
सूत्रों के अनुसार, यह अवैध कटाई कांकेर वनमंडल के डेढ़कोहका बीट के घने जंगलों में की गई है। स्थानीय ग्रामीणों ने जब लकड़ी के ठूंठ और ताजा कटे हुए तनों को देखा, तो उन्होंने तुरंत वन विभाग को सूचना दी।
सूचना मिलते ही विभागीय टीम मौके पर पहुंची और जांच के दौरान 70 से अधिक पेड़ों की अवैध कटाई की पुष्टि की।
वन अधिकारियों ने बताया कि काटे गए पेड़ों में सागौन, साल, बेंगुड़ा और शीशम जैसी कीमती प्रजातियाँ शामिल हैं। इन पेड़ों की बाजार में कीमत लाखों रुपये बताई जा रही है।
🚨 ग्रामीणों ने जताया आक्रोश
डेढ़कोहका और आसपास के गाँवों के ग्रामीणों ने वन विभाग से तुरंत कार्रवाई की मांग की है। उनका कहना है कि बीते कुछ महीनों से रात्रि के समय लकड़ी तस्कर जंगल में सक्रिय हैं और लगातार पेड़ों की कटाई कर रहे हैं।
स्थानीय निवासी रामलाल नेताम ने कहा, “हम कई बार विभाग को सूचना दे चुके हैं, लेकिन कोई स्थायी कदम नहीं उठाया गया। अब जंगल का नुकसान हमारी आंखों के सामने हो रहा है।”
🪵 लकड़ी माफिया सक्रिय, स्थानीय नेटवर्क पर शक
वन विभाग को शक है कि इस अवैध कटाई के पीछे लकड़ी माफिया का संगठित नेटवर्क काम कर रहा है।
सूत्र बताते हैं कि ये माफिया ग्रामीणों के माध्यम से स्थानीय मजदूरों को रोज़ाना के भुगतान पर जंगलों में भेजते हैं और लकड़ी को ट्रैक्टर या बैलगाड़ी से दूर-दराज़ के इलाकों तक पहुंचाते हैं।
वन परिक्षेत्र अधिकारी (RFO) ने बताया, “हमने क्षेत्र में गश्त बढ़ाई है और जिन इलाकों से लकड़ी की ढुलाई की जानकारी मिली है, वहां सर्वे शुरू किया गया है। दोषियों की पहचान के लिए सर्च अभियान चलाया जाएगा।”
🌳 पर्यावरण विशेषज्ञों की चेतावनी
पर्यावरण विशेषज्ञों ने इस घटना को गंभीर बताते हुए कहा है कि लगातार हो रही अवैध कटाई जैव विविधता और जलवायु संतुलन के लिए खतरा है।
विशेषज्ञ डॉ. अर्चना देवांगन ने कहा, “एक पेड़ को बड़ा होने में सालों लगते हैं, लेकिन कुछ घंटों में उसे काट दिया जाता है। यह जंगल के पारिस्थितिक तंत्र को असंतुलित करता है।”
उन्होंने यह भी सुझाव दिया कि स्थानीय समुदायों को “संरक्षित वन प्रहरी योजना” से जोड़ा जाए ताकि ग्रामीण ही जंगल के रक्षक बन सकें।
🏛️ विभाग ने बनाई जांच टीम
घटना की गंभीरता को देखते हुए कांकेर वनमंडल अधिकारी ने तीन सदस्यीय जांच टीम गठित की है। यह टीम यह पता लगाएगी कि किन इलाकों में कटाई की गई, कितने पेड़ प्रभावित हुए और किसने यह कार्य किया।
प्रारंभिक जांच में यह सामने आया है कि अवैध कटाई रात के समय या सप्ताहांत पर की गई, जब विभागीय गश्त कम रहती है। जांच अधिकारी ने बताया कि कुछ निशानियों से यह भी अनुमान लगाया जा रहा है कि चेनसॉ मशीनों का उपयोग किया गया है, जिससे पेड़ों को तेज़ी से काटा गया।
👮♂️ दोषियों पर कार्रवाई की तैयारी
वन विभाग ने इस मामले में अज्ञात लोगों के खिलाफ वन अपराध प्रकरण दर्ज किया है। साथ ही, क्षेत्र के सीमावर्ती इलाकों में चेकपोस्ट और नाके बढ़ाने के निर्देश दिए गए हैं ताकि लकड़ी की तस्करी रोकी जा सके।
विभागीय सूत्रों ने यह भी बताया कि कुछ संदिग्ध वाहनों की पहचान की गई है, जिनका ट्रैकिंग रिकॉर्ड अब जांच में शामिल किया जा रहा है। यदि आरोप सिद्ध होते हैं, तो दोषियों के खिलाफ वन अधिनियम 1927 और पर्यावरण संरक्षण अधिनियम 1986 के तहत कड़ी कार्रवाई होगी।
🌱 ग्रामीणों ने कहा — “हम जंगल बचाएंगे”
स्थानीय युवाओं और महिलाओं ने एकजुट होकर “हमारा जंगल, हमारी जिम्मेदारी” अभियान शुरू करने का फैसला किया है। इसके तहत हर गाँव में निगरानी दल बनाए जाएंगे, जो जंगल में किसी भी संदिग्ध गतिविधि की सूचना विभाग को देंगे।
ग्रामीणों का कहना है कि अगर सरकार स्थायी समाधान चाहती है, तो वन सुरक्षा समितियों को अधिक अधिकार और संसाधन देने होंगे।
🧩 प्रशासनिक लापरवाही पर सवाल
कुछ सामाजिक संगठनों ने आरोप लगाया है कि विभागीय स्तर पर गश्त की कमी और भ्रष्टाचार के कारण जंगलों की अवैध कटाई बढ़ रही है।
पर्यावरण कार्यकर्ता रघुनाथ साहू ने कहा, “जब तक स्थानीय प्रशासन सख्ती से काम नहीं करेगा, तब तक जंगलों की सुरक्षा केवल कागज़ों तक सीमित रहेगी।”
उन्होंने मांग की कि इस पूरे प्रकरण की स्वतंत्र जांच कराई जाए और दोषी अधिकारियों पर भी कार्रवाई हो।
🌍 जंगल बचाने की चुनौती
कांकेर जिला छत्तीसगढ़ के उन इलाकों में आता है जहाँ घने वन क्षेत्र राज्य की हरित पहचान का हिस्सा हैं। यहां की लकड़ी न केवल कीमती है बल्कि यह स्थानीय पर्यावरण और जनजीवन का आधार भी है।
विशेषज्ञों का कहना है कि यदि इस तरह की घटनाएँ नहीं रोकी गईं तो आने वाले कुछ वर्षों में जंगल का बड़ा हिस्सा उजड़ सकता है, जिससे वन्यजीवों का आवास और भूजल संतुलन दोनों प्रभावित होंगे।
🔚 निष्कर्ष
डेढ़कोहका जंगल में हुई अवैध कटाई छत्तीसगढ़ के वन संरक्षण तंत्र के लिए एक चेतावनी है। यह केवल 70-80 पेड़ों का नुकसान नहीं, बल्कि प्रकृति के संतुलन पर गहरा प्रहार है।
अब देखना यह होगा कि विभाग और प्रशासन इस बार कितनी तत्परता और सख्ती से कार्रवाई करते हैं ताकि भविष्य में ऐसी घटनाएं दोबारा न हों।







