वैश्विक बाजारों में सकारात्मक रुझान और घरेलू शेयर बाजार के मजबूत प्रदर्शन के बीच गुरुवार को भारतीय रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 14 पैसे की बढ़त के साथ 94.36 पर बंद हुआ। यह उछाल मुख्य रूप से अमेरिका और ईरान के राष्ट्रपतियों द्वारा शांति समझौते पर हस्ताक्षर किए जाने के बाद आया, जिसने वैश्विक बाजार की धारणा को बढ़ावा दिया। विदेशी मुद्रा व्यापारियों के अनुसार, इस समझौते ने दोनों देशों के बीच शत्रुता समाप्त करने और ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर बातचीत के लिए एक रूपरेखा तैयार करने का लक्ष्य रखा है, जिससे निवेशकों में आशावाद बढ़ा है।
अमेरिका-ईरान शांति समझौता और बाजार पर असर
अमेरिकी राष्ट्रपति और ईरानी राष्ट्रपति द्वारा एक समझौता ज्ञापन (MOU) पर इलेक्ट्रॉनिक रूप से हस्ताक्षर किए जाने के बाद वैश्विक बाजारों में तेजी देखी गई। इस समझौते का उद्देश्य दोनों देशों के बीच लंबे समय से चली आ रही शत्रुता को समाप्त करना और ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर बातचीत के लिए एक रूपरेखा तैयार करना है। इस घटनाक्रम ने निवेशकों की जोखिम लेने की क्षमता को बढ़ाया, जिससे उभरती अर्थव्यवस्थाओं की मुद्राओं को लाभ मिला। इस समझौते के तहत, वार्ताकार शुक्रवार, 19 जून, 2026 को जिनेवा में मिलने वाले हैं, जो आगे की प्रगति का संकेत है। यह समझौता वैश्विक भू-राजनीतिक तनाव को कम करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है, जिसका सीधा असर तेल की कीमतों और वैश्विक व्यापार पर पड़ता है।
घरेलू बाजार का प्रदर्शन और अन्य कारक
रुपये की मजबूती में घरेलू बाजार के सकारात्मक प्रदर्शन ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। प्रमुख भारतीय शेयर सूचकांकों – सेंसेक्स और निफ्टी – में उछाल देखा गया। सेंसेक्स 254.36 अंक बढ़कर 77,409.98 पर बंद हुआ, जबकि निफ्टी 82.30 अंक चढ़कर 24,168 पर पहुंचा। इसके अतिरिक्त, विदेशी संस्थागत निवेशक (FII) बुधवार, 17 जून, 2026 को 101.59 करोड़ रुपये के इक्विटी के शुद्ध खरीदार रहे, जो बाजार में पूंजी प्रवाह का संकेत है। कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट भी रुपये के लिए एक सकारात्मक कारक साबित हुई। बेंचमार्क ब्रेंट क्रूड वायदा कारोबार में 2.33% की गिरावट के साथ 77.70 डॉलर प्रति बैरल पर कारोबार कर रहा था। भारत जैसे तेल आयातक देशों के लिए कच्चे तेल की कम कीमतें आयात बिल को कम करती हैं और मुद्रास्फीति के दबाव को हल्का करती हैं, जिससे रुपये को समर्थन मिलता है।
डॉलर पर दबाव और भविष्य की चुनौतियाँ
हालांकि, अमेरिकी डॉलर की व्यापक मजबूती ने रुपये की बढ़त को सीमित करने का काम किया। अमेरिकी फेडरल रिजर्व के आक्रामक रुख के कारण विदेशी बाजारों में डॉलर इंडेक्स, जो छह मुद्राओं के मुकाबले ग्रीनबैक की ताकत को मापता है, 0.51% बढ़कर 100.59 पर कारोबार कर रहा था। फेडरल रिजर्व ने ब्याज दरों को व्यापक रूप से अपेक्षित स्तर पर स्थिर रखा, लेकिन संकेत दिया कि इस साल के अंत में कम से कम एक चौथाई प्रतिशत की दर वृद्धि हो सकती है। यह संभावित दर वृद्धि अमेरिकी डॉलर को और मजबूत कर सकती है। मीराए एसेट शेयरखान के अनुसंधान विश्लेषक अनुज चौधरी ने कहा कि अगर अमेरिका और ईरान के बीच पूर्ण समझौता नहीं होता है, तो अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने नए हमलों की चेतावनी दी है। यह अनिश्चितता भविष्य में रुपये पर दबाव डाल सकती है। इसके अलावा, फेड के आक्रामक रुख के बीच अमेरिकी डॉलर और अमेरिकी ट्रेजरी यील्ड में कोई भी रिकवरी रुपये को उच्च स्तर पर कमजोर कर सकती है।
भारत-अमेरिका व्यापार वार्ता और द्विपक्षीय संबंध
इस बीच, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपने अधिकारियों को जल्द से जल्द एक संतुलित, पारस्परिक रूप से लाभकारी और व्यावसायिक रूप से सार्थक व्यापार समझौते की दिशा में काम करने का निर्देश दिया है। विदेश मंत्रालय (MEA) ने गुरुवार, 18 जून, 2026 को यह जानकारी दी। यह निर्देश दोनों नेताओं के बीच G7 शिखर सम्मेलन के दौरान 16 महीनों में पहली बार हुई व्यापक बातचीत के एक दिन बाद आया है। इस बैठक का उद्देश्य दोनों देशों के बीच तनावपूर्ण द्विपक्षीय संबंधों को फिर से मजबूत करना था। हालांकि, यह घटनाक्रम सीधे तौर पर रुपये के दैनिक उतार-चढ़ाव का मुख्य कारण नहीं था, लेकिन बेहतर द्विपक्षीय संबंध और व्यापार समझौते की संभावना भविष्य में भारत के लिए विदेशी निवेश को आकर्षित कर सकती है, जिससे लंबी अवधि में रुपये को समर्थन मिल सकता है। कुल मिलाकर, निकट अवधि में रुपये के लिए दृष्टिकोण सकारात्मक बना हुआ है, जब तक कि वैश्विक भू-राजनीतिक या अमेरिकी फेडरल रिजर्व से संबंधित कोई बड़ा नकारात्मक विकास न हो।




