उज्जैन में आगामी सिंहस्थ-2028 की तैयारियों के बीच पवित्र शिप्रा नदी को पूरी तरह प्रदूषण मुक्त बनाने की दिशा में कार्य युद्धस्तर पर जारी है। इसी क्रम में, देश की महत्वपूर्ण जल परियोजनाओं में शामिल ‘कान्ह डायवर्शन क्लोज डक्ट प्रोजेक्ट’ का बीते शनिवार को मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव और केंद्रीय ऊर्जा, शहरी विकास एवं आवासन मंत्री मनोहर लाल खट्टर ने संयुक्त रूप से निरीक्षण किया। इस दौरान दोनों वरिष्ठ नेता निर्माणाधीन टनल के भीतर पहुंचे और परियोजना की जमीनी हकीकत का बारीकी से जायजा लिया, अधिकारियों को गुणवत्ता और समयबद्धता सुनिश्चित करने के सख्त निर्देश दिए।
परियोजना का उद्देश्य और महत्व
कान्ह डायवर्शन क्लोज डक्ट प्रोजेक्ट का मुख्य उद्देश्य कान्ह नदी के दूषित जल को पवित्र शिप्रा नदी में मिलने से रोकना है। यह परियोजना उज्जैन के लिए विशेष महत्व रखती है, क्योंकि शिप्रा नदी यहाँ के धार्मिक और सांस्कृतिक जीवन का अभिन्न अंग है, खासकर हर 12 साल में आयोजित होने वाले सिंहस्थ महापर्व के दौरान लाखों श्रद्धालु इसमें आस्था की डुबकी लगाते हैं। कान्ह नदी का गंदा पानी शिप्रा की पवित्रता को लगातार प्रभावित कर रहा था, जिससे श्रद्धालुओं और पर्यावरणविदों में चिंता थी। 920 करोड़ रुपए की भारी-भरकम लागत वाली यह महत्वाकांक्षी परियोजना इस समस्या का स्थायी समाधान प्रदान करेगी, जिससे शिप्रा का जल एक बार फिर निर्मल और स्वच्छ हो सकेगा। यह न केवल धार्मिक आस्था का प्रश्न है, बल्कि उज्जैन के पर्यावरणीय स्वास्थ्य और पर्यटन के लिए भी एक बड़ी उपलब्धि साबित होगी।
निरीक्षण और तकनीकी जानकारी
मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव और केंद्रीय मंत्री मनोहर लाल खट्टर ने उज्जैन के चिंतामन-जवासिया क्षेत्र में चल रहे इस महाप्रोजेक्ट के निरीक्षण के दौरान शाफ्ट नंबर-2 के माध्यम से टनल के गहरे भीतर तक प्रवेश किया। इस अवसर पर अपर मुख्य सचिव डॉ. राजेश राजौरा ने दोनों नेताओं को परियोजना की तकनीकी और इंजीनियरिंग विशेषताओं की विस्तृत जानकारी दी। उन्होंने बताया कि इस परियोजना के तहत ग्राम जमालपुरा में एक विशेष बैराज का निर्माण किया जा रहा है, जो दूषित जल को 30 किलोमीटर से अधिक लंबे क्लोज डक्ट और टनल सिस्टम के जरिए गंभीर बांध के डाउनस्ट्रीम तक सुरक्षित पहुंचाएगा। यह एक जटिल इंजीनियरिंग कार्य है जिसमें आधुनिक तकनीक का उपयोग किया जा रहा है ताकि जल प्रवाह को कुशलतापूर्वक प्रबंधित किया जा सके और पर्यावरण पर न्यूनतम प्रभाव पड़े। नेताओं ने अधिकारियों को स्पष्ट निर्देश दिए कि कार्य की गुणवत्ता से किसी भी प्रकार का समझौता न किया जाए और निर्धारित समयसीमा का कड़ाई से पालन किया जाए।
परियोजना की प्रगति और लागत
अधिकारियों द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार, इस पूरी परियोजना की कुल लंबाई 30.15 किलोमीटर है। इसमें 18.15 किलोमीटर में कट एंड कवर डक्ट का निर्माण शामिल है, जबकि 12 किलोमीटर की अंडरग्राउंड लंबी टनल बनाई जा रही है। राहत की बात यह है कि 12 किलोमीटर लंबी टनल का 8.15 किलोमीटर का कार्य पहले ही पूरा हो चुका है, जो परियोजना की तीव्र प्रगति को दर्शाता है। यह महत्वपूर्ण प्रगति इस बात का संकेत है कि परियोजना अपनी निर्धारित समयरेखा के अनुसार चल रही है और सिंहस्थ-2028 से पहले शिप्रा को प्रदूषण मुक्त करने का लक्ष्य प्राप्त किया जा सकता है। परियोजना पर कुल 920 करोड़ रुपए खर्च किए जा रहे हैं, जो मध्य प्रदेश सरकार और केंद्र सरकार की इस क्षेत्र के प्रति प्रतिबद्धता को दर्शाता है। इस विशाल लागत का उपयोग अत्याधुनिक तकनीक, उच्च गुणवत्ता वाली सामग्री और कुशल श्रमशक्ति के लिए किया जा रहा है ताकि परियोजना की दीर्घकालिक सफलता सुनिश्चित हो सके।
भविष्य की योजनाएं और निर्देश
इस निरीक्षण के बाद, मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव और केंद्रीय मंत्री मनोहर लाल खट्टर ने अधिकारियों को भविष्य की योजनाओं और कार्यप्रणाली को लेकर महत्वपूर्ण निर्देश दिए। उन्होंने कहा कि सिंहस्थ-2028 अब दूर नहीं है और यह परियोजना उस भव्य आयोजन की सफलता के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। उन्होंने विशेष रूप से जल शोधन और अपशिष्ट प्रबंधन के एकीकृत दृष्टिकोण पर जोर दिया, ताकि शिप्रा नदी की पवित्रता स्थायी रूप से बनी रहे। यह परियोजना न केवल कान्ह नदी के प्रदूषण को रोकेगी, बल्कि भविष्य में शहरीकरण और औद्योगिक विकास से होने वाले संभावित प्रदूषण को रोकने के लिए भी एक मॉडल के रूप में कार्य कर सकती है। दोनों नेताओं ने स्थानीय प्रशासन और संबंधित विभागों के बीच बेहतर समन्वय स्थापित करने की आवश्यकता पर भी बल दिया, ताकि परियोजना के शेष कार्यों को बिना किसी बाधा के पूरा किया जा सके। इस महाअभियान के सफल क्रियान्वयन से उज्जैन को न केवल एक स्वच्छ शिप्रा मिलेगी, बल्कि यह पर्यावरणीय संरक्षण के क्षेत्र में एक मिसाल भी कायम करेगा।






