मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने कहा कि पारंपरिक चिकित्सा प्रणाली भारत की सांस्कृतिक पहचान और जनसेवा की धरोहर है, इसे विश्व पटल पर स्थापित करना हमारा दायित्व है।
रायपुर। छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने कहा है कि भारत की पारंपरिक चिकित्सा प्रणाली (Traditional Medicine System) केवल उपचार का माध्यम नहीं, बल्कि यह हमारी सांस्कृतिक पहचान और जनसेवा की अमूल्य धरोहर है।
उन्होंने कहा कि आयुर्वेद, यूनानी, सिद्ध, योग और होम्योपैथी जैसी प्राचीन चिकित्सा पद्धतियों ने सदियों से भारतीय समाज को स्वस्थ जीवन का मार्ग दिखाया है।
मुख्यमंत्री रायपुर में आयोजित “राष्ट्रीय आयुष सम्मेलन 2025” के उद्घाटन सत्र को संबोधित कर रहे थे।
इस अवसर पर स्वास्थ्य मंत्री, वरिष्ठ आयुष अधिकारी, देशभर से आए वैद्य, चिकित्सक और शोधकर्ता मौजूद थे।
आयुष पद्धतियों से विश्व को मिला स्वस्थ जीवन का मार्ग
मुख्यमंत्री ने कहा कि विश्व आज आधुनिक दवाओं के दुष्प्रभावों से परेशान है और ऐसे में भारत की पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियां प्राकृतिक उपचार और संतुलित जीवनशैली का उदाहरण बनकर उभरी हैं।
उन्होंने कहा —
“हमारे पूर्वजों ने जो चिकित्सा ज्ञान हजारों वर्ष पहले दिया था, वह आज भी उतना ही प्रासंगिक है। योग, आयुर्वेद और औषधीय पौधों का उपयोग न केवल रोगों का इलाज करते हैं, बल्कि जीवनशैली को भी स्वस्थ बनाते हैं।”
उन्होंने यह भी जोड़ा कि भारत की यह चिकित्सा परंपरा ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ के भाव पर आधारित है — जो पूरी मानवता के कल्याण का मार्ग दिखाती है।
छत्तीसगढ़ बनेगा पारंपरिक चिकित्सा का केंद्र
मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने कहा कि राज्य सरकार का लक्ष्य है कि छत्तीसगढ़ को पारंपरिक चिकित्सा और औषधीय अनुसंधान का अग्रणी केंद्र बनाया जाए।
उन्होंने घोषणा की कि राज्य के सभी जिलों में “आयुष वेलनेस सेंटर” स्थापित किए जाएंगे, जहां ग्रामीण और आदिवासी समुदाय को निःशुल्क पारंपरिक उपचार उपलब्ध कराया जाएगा।
उन्होंने बताया कि बस्तर और सरगुजा जैसे क्षेत्रों में जड़ी-बूटी आधारित उपचार परंपरा अब भी जीवंत है।
सरकार इन परंपराओं को आधुनिक शोध और प्रशिक्षण के माध्यम से सशक्त करेगी।
“हमारा उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि जनजातीय चिकित्सा ज्ञान केवल इतिहास न बने, बल्कि आधुनिक स्वास्थ्य तंत्र का हिस्सा बने,” मुख्यमंत्री ने कहा।
पारंपरिक वैद्य और वनस्पतियों का सम्मान
मुख्यमंत्री ने कहा कि पारंपरिक वैद्य, हकीम और औषधि विशेषज्ञों ने जनस्वास्थ्य के क्षेत्र में अमूल्य योगदान दिया है।
राज्य सरकार जल्द ही ऐसे लोकवैद्यों का पंजीयन और प्रशिक्षण कार्यक्रम शुरू करने जा रही है, ताकि उनकी पहचान और परंपरा को संरक्षित किया जा सके।
उन्होंने कहा कि छत्तीसगढ़ की धरती औषधीय पौधों की संपदा से भरपूर है।
सरकार “औषधीय वनस्पति मिशन” के तहत ग्रामीणों को इन पौधों की खेती और संरक्षण के लिए प्रोत्साहन देगी।
स्वास्थ्य के साथ संस्कृति का संबंध
मुख्यमंत्री साय ने कहा कि पारंपरिक चिकित्सा प्रणाली भारतीय संस्कृति से गहराई से जुड़ी हुई है।
उन्होंने कहा —
“हमारे शास्त्रों में कहा गया है ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’। यही सिद्धांत हमारी चिकित्सा परंपरा की नींव है, जहाँ हर व्यक्ति का स्वास्थ्य समाज की सामूहिक जिम्मेदारी माना गया है।”
उन्होंने यह भी कहा कि पश्चिमी चिकित्सा पद्धतियों के साथ-साथ भारतीय चिकित्सा का प्रचार-प्रसार स्वास्थ्य समरसता (Health Harmony) की दिशा में एक बड़ा कदम है।
राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रयास
कार्यक्रम में मुख्यमंत्री ने बताया कि छत्तीसगढ़ सरकार ने विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) और राष्ट्रीय आयुष मंत्रालय के सहयोग से कई परियोजनाओं पर कार्य शुरू किया है।
इनमें आयुर्वेदिक अनुसंधान संस्थान, औषधीय पौधों का डेटा बैंक, और आयुष एक्सपोर्ट हब प्रमुख हैं।
उन्होंने कहा कि भारत जल्द ही वैश्विक स्तर पर प्राकृतिक चिकित्सा उत्पादों का प्रमुख निर्यातक बन सकता है।
इसके लिए राज्य सरकार पारंपरिक औषधियों को गुणवत्ता प्रमाणन (Quality Certification) और अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप बनाने पर काम कर रही है।
युवा पीढ़ी को जोड़ने की अपील
मुख्यमंत्री साय ने युवाओं से अपील की कि वे पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियों को केवल ‘पुरानी जानकारी’ न समझें, बल्कि इसे भविष्य की स्वास्थ्य क्रांति के रूप में अपनाएं।
उन्होंने कहा कि राज्य के विश्वविद्यालयों में “पारंपरिक चिकित्सा और औषधीय विज्ञान” के पाठ्यक्रम शुरू किए जाएंगे।
साथ ही उन्होंने सुझाव दिया कि युवाओं को स्टार्टअप मॉडल के तहत औषधीय उत्पाद निर्माण, योग थेरेपी, और प्राकृतिक उपचार केंद्र स्थापित करने के लिए प्रोत्साहित किया जाएगा।
आयुष मंत्रालय की सराहना
मुख्यमंत्री ने केंद्र सरकार के आयुष मंत्रालय की भी प्रशंसा की।
उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत ने वैश्विक मंच पर आयुर्वेद और योग को जिस स्तर तक पहुंचाया है, वह अभूतपूर्व है।
उन्होंने कहा —
“आज भारत ‘ग्लोबल हेल्थ लीडर’ के रूप में उभर रहा है और इसमें आयुष की महत्वपूर्ण भूमिका है।”
जनसेवा और संवेदना का संदेश
अपने संबोधन के अंत में मुख्यमंत्री साय ने कहा कि पारंपरिक चिकित्सा केवल शारीरिक उपचार नहीं, बल्कि मानवीय संवेदना और जनसेवा का प्रतीक है।
यह भारत के उस दर्शन को दर्शाती है, जिसमें मनुष्य और प्रकृति एक-दूसरे के पूरक हैं।
उन्होंने कहा कि इस विरासत को संरक्षित करना हर नागरिक का दायित्व है, क्योंकि यही हमारी संस्कृति की जड़ और समाज की शक्ति है।
समापन
कार्यक्रम के अंत में मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने पारंपरिक चिकित्सकों और शोधकर्ताओं को सम्मानित किया।
उन्होंने कहा कि आने वाले वर्षों में छत्तीसगढ़ आयुष और पारंपरिक स्वास्थ्य क्षेत्र में राष्ट्रीय नेतृत्वकर्ता के रूप में पहचाना जाएगा।
यह सम्मेलन पारंपरिक चिकित्सा प्रणाली के पुनर्जागरण की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम साबित होगा।






